जानें हुकुमचंद मिल के मजदूरों की दर्द भरी दास्तां

 जानें हुकुमचंद मिल के मजदूरों की दर्द भरी दास्तां
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Online Indore | Publish: Aug, 26 2015 02:30:00 AM (IST) Indore, Madhya Pradesh, India

प्रदेश सरकार की केबिनेट बैठक में हुकुमचंद मिल के मजदूरों को उनके हक का पैसा देने की बात कही गई।

इंदौर। प्रदेश सरकार की केबिनेट बैठक में हुकुमचंद मिल के मजदूरों को उनके हक का पैसा देने की बात कही गई। दरअसल मिल की हजार करोड़ की जमीन बेचकर जो पैसे सरकार को मिलेंगे उनमें से एक हिस्सा मजदूरों के परिवारों में दिया जाएगा। आज इस फैसले के आने के बाद हम आपको बताने जा रहे हैं कि किस हाल में वे मजदूर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। कुछ के घर के छप्पर नहीं हैं, तो कुछ दूसरों के घर काम करके अपना पेट पाल रहे हैं। कुछ बीमारी में इलाज नहीं करा पाएं तो कुछ ने बच्चों की स्कूल भी छुड़वा दी।

बीमारी से बेटी को नहीं बचा पाए इस गम में चल बसे

रामरती बाई केवट के पति इस मिल में मजदूर थे। वो इस दर्द को कुछ यूं अपने शब्दों में बयां करती हैं- 'मेरे पति जग्गू पिता दासु केवट हुकमचंद मिल में मजदूर थे। 1991 में मिल बंद हुआ तो उस समय पास में फूटी कौड़ी नहीं थी, फुटकर मजदूरी करके जीवन बीता रहे थे, इसी बीच बेटी गायत्री को टीबी हो गई। खाने को तो पैसे थे नहीं, इस स्थिति में उसा इलाज भी असंभव था। इलाज के अभाव में वो भी चल बसी। अपनी बेटी का इलाज नहीं करा पाने का गम उन्हें खाता रहा और आखिरकार 15 दिसंबर 2006 को वो भी चल बसे। उनके जाने के बाद से मेरी भी हिम्मत टूट गई है। जो पैसा मेरा रुका हुआ है वह मेरे पति की खून-पसीने की कमाई है।

दूसरों के घर काम कर बुढ़ापे के दिन काट रही रामदुलारी

कहने को तो वह तीन बेटों की मां है, लेकिन अकेले जीवन काटने को मजबूर है। मिल बंद होने के बाद जब तंगी हुई तो बेटों ने गलत संगत पकड़ ली। बड़ा बेटा नशे का आदी हो गया, दूसरा बेटा टेम्पो पर कंडक्टरी करता था, उसका मर्डर हो गया। तीसरा बेटा चोरी करने लगा जिससे वह जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया।

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यह दास्तां है हुकमचंद मिल के मजदूर रहे किशनलाल निषाद के घर की। पांच साल पहले स्वर्ग सिधार चुके किशनलाल की पत्नी रामदुलारी बाई बेसहारा की तरह रहती है। बीमार पड़ जाती है तो उनको डॉक्टर के पास ले जाने वाला भी कोई नहीं रहता है।

घर को सही करवा लूं ताकि छत बची रहे

चंद्रकलाबाई पति रामअवतार मौर्य की कहानी भी गमों से भरी हुई है। 17 साल पहले पति का स्वर्गवास हो गया। घर की हालत भी बहुत नाजुक है। ढहने की हालत में पूरी तरह। उन्हें जब यह हक का पैसा मिलेगा तो वे सबसे पहले अपना मकान ठीक करवाना चाहती हैं।

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वे अपने दर्द को कुछ यूं बयां करती हैं - वो तो रहे नहीं उनकी निशानी मकान ही बचा हुआ है। मिल में उनकी मेहनत का पैसा मिलेगा तो सबसे पहले इस मकान को सही करवाएंगे ताकि उनकी यादें बरकरार रहे। पैसा मिलने में अभी देरी हुई तो शायद हमसे सिर की छत भी छिन जाएगी।

सब्जी का ठेला लगाकर चला रहे घर

गांव में तंगहाली के चलते घर का सहारा बनने के लिए 1980 में रायबरेली जिले के हमिरमऊ गांव से इंदौर आए रामखिलावन हनुमान भी हुकुमचंद मिल के बंद होने से बेरोजगार हुए थे। उस समय जब 1983 में हुकमचंद मिल में रामखिलावन की नौकरी लगी तो उन्होंने सोचा कि पूरे परिवार का कर्जा भी उतार देंगे। इस बीच जब 1991 में मिल बंद हुआ तो पूरा जीवन ही खत्म हो गया। कुछ पैसे जोड़कर इंदौर में रहने के लिए जमीन खरीदी थी, अब उसी पर लोहे की चद्दर का एक मकान बनाकर मियां-बीवी रहते हैं।

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सब्जी का ठेला लगाते हैं उसी से दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त हो जाता है। बेटी है, लेकिन तंगहाली इतनी है कि उसे अपने पास रखने की हिम्मत ही नहीं होती। घर खर्च चलाना ही मुश्किल है तो ऐसे में उसकी पढ़ाई-लिखाई और उसका खर्च उठा पाने की हिम्मत ही नहीं होती। इसलिए उसे गांव भेज दिया है। मिल ने ये हालत कर दी है कि अपने ही जिगर के टुकड़े से दूर रहना पड़ता है। मिल बंद होने से परिवार बिखर कर रह गया है। मिल बंद होने के कारण बेटी मां-बाप से दूर हो गई है, वहीं हम भी दिन रात उसके लिए तड़प कर रह जाते हैं।

बेटे की पढ़ाई भी छुड़वा दी

53 वर्ष के कैलाश सिंह चौहान की माली हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें अपने बेटे की पढ़ाई छुड़वानी पड़ी। वे अपने दर्द को कुछ यूं बयां करते हैं - हुकमचंद मिल चालू था तो बड़ी शान से कहते थे कि 'हुकमचंद मिल का मजदूर हूं', लेकिन उसी मिल के कारण मेरा जीवन तो बर्बाद हुआ ही, अब बच्चों का जीवन भी खराब हो रहा है।

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जब मिल बंद हुआ तब बेटा दो साल का और बेटी एक साल की थी। जिस बेटे और बेटी को जीवन की सारी खुशियां देने की सोची थी, उस बेटे की पढ़ाई छुड़वाना पड़ी क्योंकि घर चलाने के लिए पैसों की जरूरत थी। 12वीं तक उसे पढ़ाने के बाद पढ़ाई बंद करवा दी, अब वो साउंड सिस्टम वालों के साथ काम करता है।

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