बाल दिवस पर बच्चों बने अखबार के संपादक

बाल विनय मंदिर और मल्हारआश्रम के पचास होनहार छात्र-छात्राओं के साथ हम बैठे और उन्हीं से पूछा कि वे अखबार में कैसी खबरें चाहते हैं?

By: amit mandloi

Published: 14 Nov 2017, 07:09 PM IST

बच्चों ने जैसा बताया, हमने वैसा बनाया

इंदौर. हां, बाल दिवस का यह अंक हमने बच्चों की पसंद से बनाया है यानी जैसा उन्होंने बताया... वैसा हमने बनाया। आज के दिन न्यूज टुडे के गेस्ट एडिटर बच्चे ही हैं, वो भी किसी बड़े निजी स्कूल के नहीं बल्कि सरकारी स्कूल में पढऩेवाले बच्चे। शहर के दो शासकीय स्कूल नेहरू पार्क स्थित बाल विनय मंदिर और रामबाग स्थित मल्हारआश्रम के करीब पचास होनहार छात्र-छात्राओं के साथ हम बैठे और उन्हीं से पूछा कि वे अखबार में कैसी खबरें चाहते हैं? उनकी रुचि किस तरह की खबरों में है? वे नकारात्मक खबरों को प्राथमिकता देते हैं या सकारात्मक? वे कैसे फोटो पसंद करते हैं? आदि। आज के ये बच्चे कल भारत का भविष्य होंगे। इन बच्चों से बात करके पता चला कि इनका नॉलेज किसी भी कॉन्वेंट या नामी-गिरामी स्कूल में पढऩेवाले बच्चों से बेहतर है, उनसे ज्यादा ज्ञान इनके पास है। देश के समसामयिक मुददों की अच्छी खासी पकड़ है, जानकारी है। भविष्य को लेकर भी उनका नजरिया स्पष्ट है। अधिकतर बच्चों ने पॉजिटिव व मोटिवेशनल खबरों को प्राथमिकता दी, वहीं समाज के दूसरे पहलू यानी नकारात्मक खबरों को भी शामिल करने को कहा। उनका साफ कहना था कि किसी भी मामले का सकारात्मक पक्ष ही नहीं बल्कि समाज में जो घट रहा है, जो नैतिक पतन हो रहा है, रिश्तों में जो खटास आ रही है, आए दिन नए-नए तरह के अपराध सामने आ रहे हैं, उन्हें भी जानना जरूरी है। छात्राओं ने सामने आकर कहा कि लड़कियों से जुड़े अपराध के समाचार जरूर छपना चाहिए ताकि पता चले कि समाज में उनके साथ क्या हो रहा है और वे सतर्क रहें, इसलिए दोनों ही तरह के समाचार अखबार में होने चाहिए। खैर, इन बच्चों से बात करके ये मुगालता दूर हो गया कि हम जिस तरह आज के बच्चों को कोसते हैं कि ये लोग तो मोबाइल, इंटरनेट या टीवी में ही घुसे रहते हैं, इन्हें दुनिया-जहान की खबर ही नहीं है। ये आज के अंकुर, कल के अर्जुन हैं... लक्ष्य स्पष्ट है। वे जो बनना चाहते हैं, बनकर रहेंगे... बशर्ते उन्हें उनका बचपन जीने की आजादी मिले। हम इनकी आजादी न छीनें, इन्हें खुल के बचपन जीने दें। किसी शायर ने कहा भी है- बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो/चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे। - लोकेंद्र सिंह चौहान

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