वाद्य यंत्रों से किया प्रतिमा का निर्माण, वीणा, शहनाई, पीपड़ी, ताशे, तबले और बांसुरी से बनाए बप्पा

पेशे से अकांउटेंट, लेकिन कलाकार भी जोरदार

इंदौर. पेशे से अकांउटेंट, लेकिन कलाकार भी जोरदार। पिछले 15 सालों से अलग-अलग थीम पर गणेशजी की प्रतिमा बनाने वाले किशोर गेहलोत ने इस बार वाद्य यंत्रों से बनाई गणेशजी की प्रतिमा की स्थापना की है। यंत्र भी ऐसे लगाए हैं, जो वर्तमान में संगीत के किसी बड़े कार्यक्रमों में भी देखने को न मिले, क्योंकि राजाओं के समय से प्रचलित यंत्रों का इसमें समावेश किया गया है। इन्हें देखने दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।

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दरअसल किशोर गेहलोत पिछले 20 सालों से अपने काम के साथ इस शौक को भी अंजाम दे रहे हैं। साल दर साल उनके इस हुनर में भी निखार आ रहा है और हर साल कुछ बेहतर प्रतिमाएं सामने आती हंै। एयरपोर्ट रोड स्थित अशोक नगर में रहने वाले किशोर गेहलोत हर साल अलग-अलग थीम पर गणेशजी की स्थापना करते हैं। निजी कंपनी में अकाउंटेंट की नौकरी करने वाले किशोर अब तक नारियल, माचिस, कांच के बर्तन, स्टील के बर्तन, मिट्टी क बर्तन, ड्रायफ्रूट, साइकिल, नई करंसी, थर्माकोल, नाड़े, डिस्पोजल, मशीनरी संसाधनों सहित अन्य धातुओं से गणेशजी की प्रतिमा बना चुके हैं।

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इन यंत्रों से दिया रूप

गेहलोत ने गणेशजी की प्रतिमा बनाने के लिए अपने हर साल आने वाले मित्रों से चर्चा की। इस बार उन्होंने संदेश देना चाहा कि संगीत वह भाषा है, जिसे पूरी दुनिया समझती है। इन्होंने सिंहासन के लिए पीपड़ी, हाथ के लिए चंवर से, मुंह और कान के लिए छोटे ताशे, दांत के लिए शहनाई, बड़े ताशे से पेट, डमरू झांझर से धोती, तबले से घुटने, ढोलक से पैर, रिकार्डिंग फ्लूट से मूषक और घुंघरू से पंजे का निर्माण किया है। गणेशजी के एक हाथ में वीणा और एक हाथ में झुऩझुऩा पकड़ाया गया है। खास बात है कि इसमें लगे कई यंत्र जैसे शहनाई, वीणा, रिकार्डिंग फ्लूट, पीपड़ी ये ऐसे यंत्र हैं, जो अब कम ही देखने को मिलते हैं।

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खजराना गणेश के रूप में होते हैं विराजित

गेहलोत भले ही किसी भी संसाधनों से प्रतिमा का निर्माण करते हों, लेकिन उसकी स्थापना गणेशजी के रूप में ही होती है। वे अपनी पत्नी चंदा गेहलोत, बेटे श्रीधर गेहलोत और सौरभ गेहलोत के साथ राखी पर खजराना गणेश मंदिर जाते हैं। यहां भगवान गणेश को निमंत्रण देते हैं कि प्रभु रिद्धि-सिद्धि के साथ घर पधारिए। इसके बाद प्रतिमा का निर्माण थीम के हिसाब से करना शुरू कर देते हैं। लगभग 15 दिन में प्रतिमा आकार लेती है। पिछले १५ सालों से चले आ रहे इस प्रकल्प में अब हर साल नए नए लोग जुड़ते जा रहे हैं। वर्तमान में संगीत के यंत्रों को दिलवाने में भी इन्होंने ही मदद की। यहां ऐसे संसाधनों से प्रतिमा का निर्माण हुआ है जिन्हें लोगों ने विरासत के रूप में रखा है।

रीना शर्मा Desk
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