चला गया क्रिकेट गुरु, जिसने इस खेल को मप्र में गढ़ा

चला गया क्रिकेट गुरु, जिसने इस खेल को मप्र में गढ़ा

Amit Mandloi | Updated: 07 Mar 2018, 08:10:10 AM (IST) Indore, Madhya Pradesh, India

क्रिकेट के सबसे सफल क्रिकेट प्रशासक डॉ.एमके (महेंद्र कुमार) भार्गव का मंगलवार को निधन हो गया।


- पूर्व चैयरमेन एमके भार्गव का निधन

इंदौर. मध्यप्रदेश क्रिकेट के सबसे सफल क्रिकेट प्रशासक डॉ.एमके (महेंद्र कुमार) भार्गव का मंगलवार को निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों से लीवर की बीमारी से परेशान भार्गव ने सुबह अंतिम सांस ली। शाम को बड़ी संख्या में क्रिकेटरों, एमपीसीए सदस्यों, पदाधिकारियों और डॉक्टरों की मौजूदगी में तिलक नगर मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया। पांच फरवरी १९३९ जो जन्में भार्गव १९८१ से लगातार एमपीसीए के माध्यम से क्रिकेट की सेवा कर रहे थे। ८० के दशक से क्रिकेट को मप्र में गढऩे और अंतरराष्ट्रीय उचाईंयों तक ले जाने में डॉ. भार्गव का अहल रोल रहा है। पिछले साल प्रदेश क्रिकेट को दी गई उनकी सेवाओं के चलते एमपीसीए ने उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा था। उनकी सादगी, कर्मठता और क्रिकेट के प्रति दिवानगी ऐसी थी कि ७९ साल की उम्र में भी एक युवा की तरह जुटे रहते थे। एक खास बात यह है कि नेहरू स्टेडियम से शुरू हुए इंदौर के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सफर में जितने भी बड़े मैच हुए हैं उन सभी की आयोजन समिति का प्रमुख इन्हीं बनाया गया। एक प्रशासक के रूप में उनकी भूमिका इतनी अहम थी कि इटरनेशनल मैच हो या आईपीएस जिला और पुसिल प्रशासन से लेकर सभी पक्षों से संयोजन वे ही करते थे। एमपीसीए पर जब जब कोई विपत्ती आई डॉ. भार्गव ही ऐसे किरदार थे जिन्होंने आगे आकर उसका सामना किया था। १९८१ में उन्होंने सह सचिव के रूप में पहली बार एमपीसीए में प्रवेश किया था। ये वह दौर था जब क्रिकेट में पैसा नहीं हुआ करता था, बेहद कम संसाधनों थी। इन्हीं हालत में एमपीसीए ने १९८३ में पहली बार भारत और वेस्टइंडीज के बीच अंतरराष्ट्रीय मैच इंदौर में कराया था। इस मैच में ही भार्गव की एक बेहत प्रशासक होने की झलक तत्कालीन पदाधिकारियों को मिल गई थी।

एक सूटकेस में चलता था एमपीसीए

१९८५ में भार्गव को एमपीसए का सचिव बनाया था, उसके बाद से उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा। क्रिकेट के भले के लिए वह सब कुछ किया जो जरूरी था। उनके साथी बताते हैं तब सिर्फ एक सूटकेस में डॉ. भार्गव पूरा एमपीसीए चलाते थे। न तो पैसा था न लोग। बस एक सूटकेस में सारे दस्तावेज रख भार्गव ने अंतरराष्ट्रीय मैच करा दिए। १३ साल तक सचिव रहते हुए भार्गव ने सात अंतरराष्ट्रीय मैच इंदौर में कराए थे। इंदौर के अलावा ग्वालियर में खेले गए अंतरराष्ट्रीय मैच भी भार्गव की सतत मेहनत से सफल हुए।

टीम इंडिया को संभाला
क्रिकेट के प्रति समर्पण के चलते भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने टीम के कई दौरों में डॉ. भार्गव को मैनेजर बनाया और विदेश भेजा। सचिव पद के कार्यकाल के बाद एमपीसए ने उन्हें पहले चैयरमैन, फिर उपाध्यक्ष भी बनाया। इन दिनों वे एमपीसीए ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में संगठन से जुड़े थे और हर दिन दोपहर करीब १२ से १ बजे तक होलकर स्टेडियम में समय बिताते थे। क्रिकेट के अलावा भार्गव एक कान, नाक और गले के अच्छे डॉक्टर थे।

वर्जन..

सिर्फ क्रिकेट को देने आए थे
हमने मप्र के एक महान क्रिकेट प्रशासक को खो दिया है। डॉ. भार्गव क्रिकेट से तब जुड़े थे तब इसमें कुछ नहीं था। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस खेल को समर्पित किया है। आज एमपीसीए जिस मजबूती के साथ देश और दुनिया में नाम कमा रहा है उसमें डॉ. भार्गव का अहम रोल है। उन्होंने कभी क्रिकेट से कुछ चाहा नहीं है सिर्फ दिया है। मैं जब क्रिकेट खेला करता था तब से उनसे जुड़ा था, उन्होंने मुझे काफी सिखाया है।

संजय जगदाले
क्रिकेट डायरेक्टर, एपीसीए

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स्पष्टवादिता के मुरीद थे सभी

डॉ. भार्गव की व्यक्तित्व की खास बात यह थी कि वे बिल्कुल स्पष्टवादी थी। जो काम होगा तो हां वरना साफ मना कर देते थे। इनके इस गुण के कारण एमपीसीए क्या बीसीसीआई के पदाधिकारी भी प्रभावित थे। लोगों की मदद करने में वे हर समय आगे रहते थे। मुझे वे अपना छोटा भाई मानते थे और क्रिकेट कमेंट्री के दौरान मुझसे होने वाली गलतियों में कई बार टोकते भी थे, मेरी सफलता में उनका भी अहम योगदान है। लोग अब क्रिकेट से कुछ हासिल करने के लिए जुड़ते हैं लेकिन वे ऐसे शख्स थे जिन्होंने इस खेल को सिर्फ दिया है। आखिरी दम तक वे क्रिकेट की सेवा करते रहे।
सुशील दोषी

पद्मश्री और क्रिकेट कमेंट्रेटर

 

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