dhanteras 2017 - केसरिया सोने में गढ़ा सराफे का भरोसा

Arjun Richhariya

Publish: Oct, 13 2017 10:40:53 (IST)

Indore, Madhya Pradesh, India
dhanteras 2017 - केसरिया सोने में गढ़ा सराफे का भरोसा

सराफा और एमजी रोड पर गोल्ड-डायमंड स्ट्रीट बना रही नई पहचान

इंदौर. इंदौर होलकरकाल से व्यापार के लिए भरोसे का शहर है। वक्त के साथ इसकी तस्वीर बदलती गई। सराफा बाजार पूरी तरह बदल गया। यहां की नामी पेढि़यों से एमजी रोड गोल्ड-डायमंड-प्लेटिनम की नई स्ट्रीट बन गया।

बावजूद इसके सराफा की ज्वेलरी के केसरिया सोने में गढ़ी गई ज्वेलरी का विश्वास और साख आज भी कायम है। 1880 में केसरिया सोने से शुरू हुआ सफर 80 टंच के रास्ते पर दो-तीन दशक तक चलता रहा। यहां के ग्राहकों का सबसे बड़ा भरोसा ज्वेलरी की रिटर्न वैल्यू और शुद्धता पर खरा होना है। ज्वेलरी में कलात्मक और रचनात्मक प्रयोगों ने सराफा बाजार को नई पहचान दी है। करीब 137 साल पुराना यह बाजार वक्त के साथ पूरी तरह बदल गया है। आज यहां दुकानों की जगह शोरूम बन गए। छोटा सराफा में जरूर सफेद गादी पर व्यापार करने की परंपरा निभाती कुछ दुकानें हैं। तीन पीढ़ी से बाजार में साख बनाए हुए जवाहरलाल एम. नीमा का कहना है, सराफा की साख बनाने में यहां के कारोबारियों की एक सदी की मेहनत है। सोने-चांदी-जवाहरात व्यवहार व भरोसे का धंधा है। एक बार ग्राहक आपकी पेढ़ी चढ़ गया और शुद्धता पर भरोसा कर लिया तो वह सालों तक नहीं छोड़ता है।

दूसरी खोटा काम नहीं करें, क्योंकि इसकी खरीदारी का केंद्र बिंदु महिलाएं होती हैं। एक बार खोट कर दी तो फिर दोबारा नहीं आएंगी। तीसरी बात ज्वेलरी की रिटर्न वैल्यू है। 10 साल बाद भी यदि वह आए और बेचे तो वही शुद्धता के साथ दाम मिलना चाहिए। नई पीढ़ी ने इसे आधुनिक ब्रांडेड बाजार के दौर में भी इन तीनों कसौटियों पर खरा रखा है। पिछले 20 साल में जमी हुई पेढि़यों ने नए शोरूम बना लिए। मद्रास, जलगांव, अहमदाबाद के शोरूम यहां आ गए, लेकिन इंदौरी सराफा में पुष्य नक्षत्र व धनतेरस के दिन उमड़ती भीड़ हमारी साख का विस्तार है।

सराफा एसोसिएशन के सचिव अविनाश शास्त्री व बसंत सोनी का कहना है, बदलते दौर के साथ व्यापार का तरीका बदल दिया। 1880 के आसपास बाजार की शुरुआत हुई थी। होलकरकालीन टकसाल भी यहीं होती थी। पहले कुछ ही दुकानदार थे, अब यह संख्या 2200 के आसपास पहुंच गई है।

मोहर के दौर में भी दिखा रहे जौहर
कारोबारी नीमा बताते हैं, शुरुआती दौर से ही सोने की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान दिया गया। 60-70 के दशक तक केसरिया सोने के गहने मिलते थे। यानी 10 ग्राम में 9.2 ग्राम तक सोना होता था। बाद में इसे आकर्षक और कलात्मक बनाने के लिए 80 टंच नाम दिया गया। इसमें चांदी और तांबे की मिलावट से कुछ असर आया और लोगों का रुझान मोहर वाले सोने की तरफ होने लगा। नई पीढ़ी ने इसकी शुद्धता को कारोबार का मार्का बना लिया है। अब सोने को गलाने पर 92 प्रतिशत सोना मिल रहा है। अधिकांश ज्वेलरी पर मोहर लग रही है।

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