जेल में ही हुए शिक्षित, अब अन्य को दे रहे अक्षर ज्ञान

जेल में ही हुए शिक्षित, अब अन्य को दे रहे अक्षर ज्ञान

Manish Yadav | Publish: Sep, 08 2018 01:01:01 PM (IST) Indore, Madhya Pradesh, India

विश्व साक्षरता दिवस - निरक्षर थे, जेल में रहकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक कर लिया

मनीष यादव @ इंदौर
विषम परिस्थितियोंं में खुद पढ़ नहीं सके और अपने हाथों हुए अपराध के चलते सलाखोंं के पीछे चले गए। जेल पहुंचकर अपराध बोध भी हुआ। इस कमी का अहसास हुआ कि पढ़े-लिखे नहीं होने के कारण उनका क्या हश्र हुआ। इसके बाद उन्होंने जेल के अंदर न सिर्फ पढ़ाई की, बल्कि अब वे दूसरों को भी साक्षर बना रहे हैंं। वे चाहते हैं कि कोई दूसरा उनके जैसा न रह जाए, जो उन्होंने भुगता, वो अन्य लोग न भुगतें।
सेंट्रल जेल अधीक्षक संतोष सोलंकी के अनुसार जेल में आने वाले हर कैदी के बारे में जब जानकारी ली जाती है तो उसने कहां तक पढ़ाई की है, उसे लिखना-पढऩा आता है या नहीं आदि पूछा जाता है। जो निरक्षर हैं, उन्हें साक्षर बनाने के लिए अलग से पांच क्लास चलाई जाती हैं। उन्हें जेल में न सिर्फ साक्षर बनाया जाता है, बल्कि आगे पढऩे के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
सोलंकी बताते हैं कि इन कैदियों में से कुछ को अंदर आने के बाद जब लगा कि पढ़े-लिखे न होने के कारण वे अपराध कर बैठे तो पढ़ाई में जुट गए और आज वह खुद दूसरों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। वे जेल में चलने वाले स्कूल में स्टाफ के साथ मिलकर कैदियों को पढ़ाने में लगे हैं। वह बैरक में भी कैदियों को पढ़ाते हैं, ताकि स्कूल में बताई गई बातों को ध्यान रख सकें।

जैसे-तैसे नाम लिख पाता था, आज पढ़ा रहा
बुरहानपुर निवासी अशोक सेन हत्या के एक मामले में जेल में बंद है। उसके अनुसार वह मजदूरी के लिए यहां आया था। मजदूरी के रुपयों को लेकर विवाद हुआ और उसके हाथों हत्या हो गई। मामले में सजा हुई। जब वह जेल पहुंचा तो उसे सिर्फ अक्षर ज्ञान था। जैसे-तैसे अपना नाम लिख पाता था। जेल अफसरों की काउंसलिंग के बाद मन में पढऩे-लिखने की इच्छा जागी। आज वह फर्राटेदार अंग्रेजी बोल लेता है। पढ़ाई के दौरान उसे लगा कि कई अन्य कैदी ऐसे हैं, जो अपना नाम तक नहीं लिख पाते। इस पर उसने ठान लिया और ऐसे कैदियों को पढ़ाने में लगा हुआ है।

जेल में रहते ही बन गया टीचर
सेंट्रल जेल में राकेश पिता पूनाजी 2007 से सजा काट रहा है। जेल अफसरों के मुताबिक राकेश जब आया, तब पढ़ाई-लिखाई कर रहा था। परिवार में किसी बात पर विवाद हुआ और उसके हाथों रिश्तेदार की मौत हो गई। हत्या का केस चला और सजा हो गई। पढ़ाई अधूरी छूट गई। जेल में आने के बाद कुछ समय वह खाली बैठा रहा। बाद में अहसास हुआ कि पढ़ाई जारी रख कर वह कुछ कर सकता है। उसने जेल में रहते हुए ग्रेजुएशन किया। दो अलग-अलग विषयों में एमकॉम कर लिया। इसके साथ ही वह जेल में कैदियों को पढ़ाने में लग गया। वह कैदियों को न सिर्फ साक्षर कर रहा है, बल्कि आगे की पढ़ाई कर अपने कामकाज में महारत हासिल करने के लिए भी प्रेरित करता है।

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