सरकार को गेहूं बेचने में डर रहे अन्नदाता, जानिए क्या है मामला

सरकार को गेहूं बेचने में डर रहे अन्नदाता, जानिए क्या है मामला

Mohit Panchal | Publish: Apr, 17 2019 11:29:14 AM (IST) Indore, Indore, Madhya Pradesh, India

आशंका : कहीं बैंक वाले लोन राशि की न वसूल लें, 25 हजार से अधिक ने करवाया रजिस्ट्रेशन, सिर्फ 4500 किसान पहुंचे मंडी

मोहित पांचाल द्य इंदौर
किसान समर्थन मूल्य पर सरकार को गेहूं बेचने से डर रहे हैं। इंदौर जिले में 25 हजार से अधिक किसानों ने रजिस्ट्रेशन करवाया है, लेकिन बेचने के लिए सिर्फ 4500 किसान ही पहुंचे, जबकि मंडी में माल की जबर्दस्त आवक है। सच्चाई ये है कि किसानों को डर है कि गेहूं से मिलने वाली राशि कहीं लोन में जमा न हो जाए। गौरतलब है कि सरकार 1840 रुपए के भाव से गेहूं खरीद रही है।

दरअसल पर्दे के पीछे की कहानी कुछ ओर ही है। सच्चाई ये है कि किसान सरकार को समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने से डर रहा है। किसान के इस डर का एक मजबूत कारण भी है। दरअसल किसान इस बात से खौफजदा है कि अगर वह अपनी उपज सरकार को बेचता है तो उसका पैसा सीधे आईपीसी बैंक से जुड़ी संस्था वाले उसके खाते में जाएगा। अधिकतर किसानों ने इन्हीं संस्थाओं से कर्जा ले रखा है।

किसानों को डर है कि यह संस्थाएं उनकी उपज के एवज में मिले पैसे को लोन खाते में एडजस्ट कर लेगी। एक सच्चाई यह भी है कि कांग्रेस की कर्जमाफी का वादा भी अभी आधा-अधूरा है। सरकार ने आदेश तो जारी कर दिया, लेकिन अब तक किसानों को कर्ज माफी के दस्तावेज नहीं मिले हैं। ऐसे में किसान के मन में यह शंका उठना लाजमी है कि कहीं उनको मिले पैसे से संस्था लोन की वसूली न कर लें।

समर्थन मूल्य से कम में बेचने को तैयार
इंदौर की मंडियों में पिछले दिनों किसानों के बवाल पर सवाल खड़ा हुआ था। किसानों का आरोप था कि व्यापारी 1700 रुपए के भाव में गेहूं खरीद रहे हैं, जबकि समर्थन मूल्य 1840 रुपए है। इसके बावजूद किसान माल व्यापारियों को ही देना पसंद कर रहे हैं।

इसका कारण यह है कि व्यापारी उन्हेंं नकद पैसा नहीं दे रहे हैं। व्यापारी 50 हजार नकद देकर खाते में पैसा जमा करता है, मगर वह खाता राष्ट्रीयकृत बैंक का है, जिसमें से लोन चुकता करने का कोई डर नहीं होता।

किसानों को होगा नुकसान
कर्ज माफी के फेर में उलझे किसानों को फायदे के साथ नुकसान भी होगा। होता यूं था कि 31 मार्च तक किसानों का खाता साफ-सुथरा रहता था तो उन्हें तीन प्रतिशत ब्याज माफ होता है मगर अब उन्हें तीन प्रतिशत का नुकसान झेलना होगा। दूसरी ओर संस्थाओं का सारा कामकाज ठप है क्योंकि कोई भी किसान पैसा भरने नहीं जा रहा।

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