मालवा-निमाड़ में बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं पर सरकार दो साल बाद भी निरुत्तर

- पत्रिका में प्रकाशित खबरों के आधार पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई

 

- युगल पीठ ने जवाब देने के लिए दिया एक सप्ताह का आखिरी मौका

इंदौर. मालवा और निमाड़ के सरकारी अस्पतालों और डिस्पेंसरी की दुर्दशा और मरीजों के लिए अनिवार्य सुविधाएं तक नहीं होने को लेकर हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर दो साल बाद भी सरकार निरुत्तर है। कोरोना के चलते लंबे समय बाद मंगलवार को याचिका पर सुनवाई हुई। जस्टिस सुजोय पॉल और जस्टिस अनिल वर्मा की युगल पीठ में जवाब पेश नहीं होने पर नाराजगी जाहिर की गई है। कोर्ट ने एक सप्ताह में जवाब पेश करने का आखिरी मौका दिया है। अस्पतालों की वास्तविक स्थितियों की पोल खोलते हुए पत्रिका द्वारा प्रकाशित की गई खबरों को आधार बनाकर याचिका दायर की गई थी। इस मामले में प्रदेश के साथ ही केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किए गए थे, अब तक किसी ने भी जवाब नहीं दिया है। याचिका के माध्यम से मांग की गई है कि मालवा-निमाड़ सहित प्रदेश के सभी शासकीय अस्पतालों और डिस्पेंसरी में पर्याप्त संख्या में डॉक्टरों की नियुक्ति की जाए। सहयोगी स्टाफ की कमी को भी नई भर्तियां कर खत्म किया जाए। कई अस्पतालों में मरीजों को लाने-ले जाने के लिए एम्बुलेंस तक नहीं हैं, उनकी सुविधाएं तत्काल दी जाए। एक्सरे, सिटी स्कैन, एमआरआइ, सोनोग्राफी सहित मरीजों की जांच की अन्य व अनिवार्य सुविधाएं जिन अस्पतालों में नहीं है वहां मुहैया कराई जाएं। भविष्य शर्मा ने एडवोकेट मनीष विजयवर्गीय के माध्यम से यह याचिका दायर की है। विजयवर्गीय ने बताया, हमने याचिका में यह भी मांग की है कि जो नए डॉक्टर बन रहे हैं उन्हें अनिवार्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में प्रैक्टिस के लिए भेजा जाए।

विकास मिश्रा
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