कोरोना काल में हिंगोट, आग के गोलों से होने वाले युद्ध पर असमंजस

रियासतकाल से चली आ रही है युद्ध की परंपरा में तुर्रा और कलंगी योद्धाओं के बीच होता है जानलेवा भीषण युद्ध, देशभर से तुर्रा और कलंगी योद्धाओं को देखने आते हैं सैलानी

By: Hitendra Sharma

Published: 13 Nov 2020, 12:57 PM IST

इंदौर. इंदौर के पास खेले जाने वाले हिंगोट मेला दीपावली के अगले दिन गौतमपुरा कस्बे में विक्रम संवत की कार्तिक शुक्ल प्रथमा को शुरू होता। इस दौरान दो गांवों के लोग एक-दूसरे पर जलता हुआ हिंगोट फेंकते हैं। गौतमपुरा के योद्धाओं के दल को ‘तुर्रा’नाम दिया जाता है, जबकि रुणजी गांव के लड़ाके ‘कलंगी’ दल की अगुवाई करते हैं।

क्या है हिंगोट
‘हिंगोट’ दरअसल आंवले के आकार वाला एक जंगली फल है। जिसकी पैदावार देपालपुर इलाके में होती है। फल का गूदा निकालकर इसे खोखला कर लिया जाता है। फिर इसमें कुछ इस तरह बारूद भरी जाती है कि आग दिखाते ही यह किसी अग्निबाण की तरह सर्र से निकल पड़ता है।

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कोरोना से जिस तरह से पूरी दुनिया के परंपराओं और लोगों की जीवन को बदल दिया उसे देखकर लगता है कि इस बार हिंगोट भी कोरोना के बीच कैसे होगा। इस परंपरागत अग्नियुद्ध में गांव के दो दलों के बीच जलते हुए आग के गोले यानि की हिंगोट को फैंका जाता है। युद्ध के दौरान दोनों दलों के कई योद्धा घायल हो जाते हैं। हिंगोट युद्ध पर प्रशासन की ओर से शांति समिति की बैठक बुलाई गई थी जो बेनतीजा रही अभी तक इसकों लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

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हिगोट युद्ध को लेकर प्रशासन और पुलिस ने साफ तौर पर हाथ खड़े कर दिये हैं। पुलिस का कहना है कि इस बार युद्ध नहीं होगा, पर स्थानीय जनप्रतिनिधि प्रशासन से उलट परंपरा को कायम रखने की बात कह रहे हैं। वही कुछ लोग हिंगोट परंपरा को जीवित रखने सांकेतिक युद्ध करने की भी बात कर रहे हैं। वहीं, हिंगोट युद्ध को लेकर प्रशासन का विरोध शुरु हो गया है। लोग सोश मीडिया पर निकाय चुनाव बहिस्कार की बात कह रहे हैं।

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अनुमित में चुनावी सभा और युद्ध अलग क्यों?
देपालपुर के विधायक विशाल पटेल ने प्रशासन के हिंगोट पर रोक लगाने के बयान के बाद कहा है कि अभी उपचुनाव में जिस तरह से लोग जमा हुए तब भी प्रशासन नें अनुमति दी थी हिंगोट युद्ध इस इलाके की परंपराओं से जुड़ा हुआ है। धार्मिक आस्था से जुड़ा है, इसलिए अनुमति मिलनी चाहिए।

युद्ध की तैयारी जारी
दोनों दल के योद्धाओं ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की बात के बेफिक्र तैयारी में जुट गये हैं। एक तरफ प्रशासन इस रोकने का प्रयास कर रहा है वही दूसरी तरफ लोग परंपरा को कायम रखने की बात कह रहे हैं। अब यह युद्ध होगा या नहीं, यह तो उसी दिन ही पता चलेगा।जब गोवर्धन पूजा होगी और गौतमपुरा की गलियां में सन्नाटा रहेगा या आग के गोले बरस रहे होंगे।

वही इंदौर डीआईजी हरिनारायण मिश्र ने अपील की है कि इस युद्ध में कई लोग की जान चली गई साथ ही कई घायल होते रहे हैं। इसलिये समझाइश दी जाती रही है कि इसे छोटे स्तर पर मनाया जाए। यदि युद्ध होता भी है तो लोगों को कोरोना गाइडलाइन का पालन करना होगा।

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