हुकमचंद मिल से 15 जून के बाद हटाएं अतिक्रमण

मजदूरों की याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई, कहा-

इंदौर. करीब 30 साल से अपने हक के पैसों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हुकमचंद मिल के मजदूरों की याचिका पर गुरुवार को हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस रोहित आर्य की एकल पीठ ने नगर निगम को आदेश दिए कि 15 जून के बाद मिल की जमीन पर हुए अतिक्रमणों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। चूंकि मुख्यपीठ ने कोरोना के चलते १५ जून तक अतिक्रमण हटाने या तोड़-फोड़ पर रोक लगा रखी है, इसलिए इसके बाद कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने नगर निगम परिषद की फरवरी 2020 में हुई आखिरी बैठक में हुकमचंद मिल की जमीन की लीज निरस्त करने से जुड़े प्रस्ताव पर रोक जारी रखने के आदेश दिए हैं। नगर निगम को मजदूरों को पैसे देने का कोर्ट के समक्ष टाइम बाउंड प्रोग्राम गुरुवार को पेश करना था, लेकिन फिर समय मांग लिया गया। चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई होगी।
हुकमचंद मिल के ५८०० मजदूरों को बकाया १७९ करोड़ रुपए की राशि लौटाई जानी है, लेकिन एक बार फिर निगम के वकील ने समय मांग लिया। मजदूरों के एडवोकेट धीरज सिंह पंवार ने आपत्ति ली। उन्होंने कहा, कोर्ट के आदेश के बावजूद निगम ने 14 महीने में भी मजदूरों को उनका पैसा चुकाने की योजना नहीं बनाई है। कोरोना काल में 15 महीने में मिल के 120 से अधिक मजदूरों की जान जा चुकी है। मजदूरों को जल्द उनका पैसा दिलाया जाए। मजदूरों को जमीन नहीं बस उनके हक का पैसा मिलना चाहिए। इस पर कोर्ट ने शासन और नगर निगम को अगली सुनवाई में पैसे चुकाने का पूरा प्लान पेश करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट की अनुमति के बगैर लीज निरस्ती का प्रस्ताव लाने पर भी शपथ-पत्र पर स्पष्टीकरण मांगा है। मजदूरों का कहना है, निगम को लीज निरस्ती का प्रस्ताव लाने का अधिकार ही नहीं है, क्योंकि करीब 20 साल से तो हाई कोर्ट में मामला विचाराधीन है। सरकार, नगर निगम सहित अन्य पक्ष मामले में अनावश्यक विलंब करा रहे हैं, दूसरी तरफ लगातार बुजुर्ग मरीजों की जानें जा रही हैं, इसलिए जल्द से जल्द इस मामले का निराकरण कर मजदूरों को उनके हक का पैसा लौटाया जाना चाहिए।
30 साल पहले बंद हुई थी मिल
मजदूर नेता नरेंद्र श्रीवंश और हरनाम सिंह धालीवाल ने बताया, ३० साल पहले 12 दिसंबर 1991 को हुकमचंद मिल बंद हो गई थी। इसके बाद से मिल के मजदूर मुआवजे के लिए भटक रहे हैं। करीब 5800 मजदूरों का 229 करोड़ रुपए बकाया था, कोर्ट की सख्ती के बाद अब तक सिर्फ ५० करोड़ रुपए मिला है। 179 करोड़ रुपए बाकी है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट वर्षों पहले मिल की जमीन बेचकर मजदूरों को भुगतान करने का आदेश दे चुका है, लेकिन कागजी अडंग़ों के चलते जमीन बिक नहीं रही।
सात बार निकल चुकी है निविदा
एक दशक पहले कोर्ट ने मिल की जमीन बेचकर मजदूरों का भुगतान करने के आदेश दिए थे, लेकिन सात बार नीलामी की निविदा निकालने के बावजूद जमीन बिक नहीं सकी। मिल की जमीन का लैंड यूज बदल दिया गया, जिससे उम्मीद बनी थी, जमीन अच्छे दाम पर बिक जाएगी और मजदूरों का भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन मामला फिर अटक गया।

रमेश वैद्य Desk
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