सही व्यवस्था नहीं होने के कारण नहीं उठ रहा रोजाना कचरा

कचरा गाडिय़ों की स्थिति, मॉनिटरिंग का न होना और कर्मचारियों और यूनियनों के कारण बिगड़ रही शहर की व्यवस्था

By: amit mandloi

Published: 10 Jun 2018, 11:30 AM IST

इंदौर.
शहर में कचरा संग्रहण की व्यवस्था पहले की बजाए कमजोर हुई है। ये बात अब खुद महापौर मालिनी गौड़ भी मान रही हैं। सफाई में देश के नंबर 1 शहर में इस हालत के पीछे जो मूल कारण हैं उसमें सबसे नगर निगम की व्यवस्थाओं को लेकर बरती जा रही ढि़लाई ज्यादा है। इंदौर नगर निगम को रोजाना औसत 20 शिकायतें ऐसी मिल रही हैं, जिनमें कचरा वाहन कचरा लेने नहीं आया है। वहीं शिकायत होने के बाद उन क्षेत्रों में कचरे की व्यवस्था दो दिन बाद ही सही हो जाती है। लेकिन फिर दूसरी शिकायत आ जाती है। लगातार ऐसी शिकायतें आने के बाद भी इनका निराकरण करने के लिए न तो महापौर और न ही नगर निगम के अफसर किसी का ध्यान नहीं है।
ये हैं तीन मूल कारण
कचरा गाडिय़ां
नगर निगम ने जो आंकलन किया था, उसके मुताबिक शहर में 6०0 गाडिय़ों होने पर शहर से पूरा कचरा घरों से उठाया जा सकता था। इसके चलते नगर निगम ने 604 गाडिय़ां खरीदी थी। इनमें से ४९३ गाडिय़ां घर-घर से कचरा लेने के लिए जबकी 111 गाडिय़ां छोटी जगह से बल्क में कचरा उठाने के लिए ली गई थी। निगम की व्यवस्था के हिसाब से एक गाड़ी को सुबह और शाम दोनों समय मिलाकर कम से कम 5 ट्रीप लगाना है। केंद्र सरकार की गाइड लाइन के हिसाब से शहर में बने रूट प्लान के मुताबिक 437 गाडिय़ां ही शहर में कचरा उठाने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन निगम ने उससे ज्यादा गाडिय़ां लगा रखी हैं। इसके अलावा हर जोन पर एक जेसीबी और एक डंपर भी कचरे के लिए लगाया गया है।
अफसर बताते हैं ये कारण -
अफसरों के मुताबिक शहर में अभी भी गाडिय़ों की कमी है। कचरा गाडिय़ों के खराब होने और अन्य कारणों से खड़ी होने के कारण वार्डों में से कचरा नहीं उठ पाता है। वहीं कर्मचारियों के छुट्टी पर जाने के कारण बदली के ड्रायवर होने के कारण ये स्थिति बन जाती है।
ये है खेल
आवश्यक्ता से अधिक वाहनों के होने के बाद भी वाहनों की संख्या में कमी बताने के पीछे मुख्य वजह दूसरी है। दरअसल निगम के अधिकारी कचरा वाहनों की कृत्रिम कमी के बहाने से और भी वाहन खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं। घर-घर से कचरा न उठाए जाने के समय शहर में लगने वाले कचरे के ढ़ेरों को हटाने के लिए हर जोन पर एक जेसीबी और एक डंपर नगर निगम ने कचरा गाडिय़ों की व्यवस्था के लिए लगाया था। दो सालों से शहर में घर-घर से कचरा उठाने की पूरी व्यवस्था होने के बाद भी जोनल कार्यालयों पर कचरे का ढ़ेर हटाने के लिए एक जेसीबी और एक डंपर लगातार काम कर रहे हैं। जबकि नगर निगम खुद इस बात को मानता है कि शहर में कहीं भी कचरा नहीं है।
मॉनिटरिंग
शहर में सफाई की व्यवस्था के लिए माइक्रो लेवल मॉनिटरिंग का सिस्टम जरूरी है। इसे निगम ने खड़ा भी किया था। नगर निगम में कचरा उठाने और सफाई करवाने का पूरा जिम्मा दरोगा और सीएसआई का है। इसीके लिए इन्हें नगर निगम ने गाड़ी और वॉकीटॉकी सेट भी दे रखा है। इसके अलावा स्वास्थ्य अधिकारी, जोनल अधिकारियों सहित प्रभारी अधिकारी के तौर पर कार्यपालन यंत्री और उपायुक्त स्तर के अफसरों को भी नगर निगम ने जिम्मेदारी दे रखी है।
यहां हो रही चूक
सफाई व्यवस्था की माइक्रो लेवल मॉनिटरिंग का सिस्टम बर्बाद हो चुका है। सफाई का निचले स्तर पर निरीक्षण करने वाली दोनों इकाइयां या तो काम नहीं कर रही हैं या काम में लापरवाही बरत रही हैं। हालत ये है कि कचरा गाडिय़ां अपने रूट के हिसाब से क्षेत्रों में पहुंची या नहीं इसकी जानकारी ये अधिकारी लेते ही नहीं है। गाडिय़ां पूरी तरह से ड्रायवरों के भरोसे ही चल रही है। जबकि दरोगा का काम ही ये है कि वो उसके क्षेत्र की सभी गाडिय़ों को समय पर उनके रूट के हिसाब से चलवाए यदि कोई गाड़ी नहीं है तो उस गाड़ी की तुरंत उस क्षेत्र में दूसरी गाड़ी की व्यवस्था करवाए या संबंधित क्षेत्र के लोगों को गाड़ी के देरी से आने या नहीं आने की जानकारी पहुंचाए। गाडिय़ों अपने रूट के हिसाब से संबंधित क्षेत्र में गई है या नहीं इसकी डिजिटल मॉनिटरिंग का सिस्टम लगभग ठप हो चुका है। हालत ये है कि सीएसआई और दरोगा क्षेत्र में गाडिय़ों को पहुंचाने के बजाए अपने क्षेत्र में से निकलने वाले जूलूस, शवयात्राओं के पीछे गाड़ी लगवाकर वहां की सफाई करवाने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। बजाए घरों से समय पर कचरा उठवाने के। निगम की सभी गाडिय़ों में जीपीएस लगा है, जिससे वे दिन में कहां गई कितनी देर तक वहां रहीं इस सबकी जानकारी एक कंट्रोल रूम से ही ली जा सकती है। लेकिन सवेरे के समय इसकी जानकारी नहीं ली जाती है। जिसके कारण गाडिय़ों की स्थिति सपष्ट नहीं हो पा रही है। यही हाल सड़क किनारे लगने वाली झाडू के मामले में भी हो रहा है। उपर के कचरे को साफ करने पर तो ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन सड़क पर फैलने वाली धूल को सफाई करवाने पर कोई भी दरोगा ध्यान नहीं दे रहा है। हालत ये है कि सड़कों के किनारे और डिवाइडर पर धूल वापस से दिखने लगी है।
कर्मचारी और कर्मचारी यूनियनें
पूर्व निगमायुक्त मनीष सिंह के समय नगर निगम में सफाई व्यवस्था में कर्मचारियों की नियुक्ती से लेकर किन लोगों की नियुक्ती की जानी है, ये निगम में मौजूद छह सफाई कर्मचारी यूनियनों के द्वारा तय किया जाता था। कर्मचारियों की नौकरी और कर्मचारियों को बाहर किए जाने और वापस नौकरी पर लिए जाने के नाम पर होने वाली गड़बड़ी की कई शिकायतें भी इस दौरान हुई थी। इंदौर नगर निगम आयुक्त का चार्ज लेने के बाद आशीष सिंह ने इस व्यवस्था को बदल दिया था।
ये पड़ा असर
दरअसल पुरानी व्यवस्था में यूनियनों के नेताओं ने अपनी नेतागिरी चमकाने के साथ ही निगम से कई तरह के फायदे भी लिए। यहां तक की अधिकांश जोनल कार्यालय पर मौजूद सीएसआई और अधिकांश वार्डों के दरोगा तक यूनियनों के नेताओं की पसंद के हैं। नई व्यवस्था को यूनियनों के नेता स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इसमें उनका साथ उनके द्वारा रखवाए गए सीएसआई और दरोगा भी दे रहे हैं। जिसके कारण निचले स्तर की मॉनिटरिंग का सिस्टम बर्बाद किया जा रहा है। अफसरों पर एक तरह से दबाव बनाकर अपनी पसंद का सिस्टम खड़ा करवाने के लिए उन्हें मजबूर किया जा रहा है। इसी तरह से कचरा गाडिय़ों को मिलने वाले डीजल की चोरी के लिए भी गाडिय़ों के फेरे भी कर्मचारी कम कर देते हैं।

शिकायतों को देख भड़की महापौर
शहर में कचरा गाडिय़ों के चलने क बाद कचरे से जुड़ी सभी शिकायतें खत्म हो जाना चाहिए, लेकिन उसके बाद भी लगातार शिकायतें आ रही थी। बीते एक माह में नगर निगम को महापौर हेल्पलाइन-311 से 1910 शिकायतें मिलीं। जिनमें 900 शिकायतें कचरे से जुड़ी हुई मिली थी। लगातार शिकायतें आने के बाद महापौर मालिनी गौड़ सफाई व्यवस्था को लेकर नाराज हुई थी। उन्होने इसके बाद स्वास्थ्य समिति प्रभारी संतोष गौर को शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर दौरे कर जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी दी थी। गौर ने जो रिपोर्ट दी थी। उसमें तीन तथ्य सामने आए थे। जिसमें जेल रोड और सपना संगीता सड़क पर लीटरबीन को कचरा पेटी की तरह इस्तेमाल करना, शहर में सही तरीके से झाडू नहीं लगने के साथ ही शहर के कई इलाकों में गाडिय़ां नहीं पहुंचने को उन्होने सही माना था। जिसके बाद महापौर ने बैठक लेकर सभी अफसरों को फटकार लगाई थी।
निगम के लिए फायदे का सौदा है कचरा
शहर में कचरा लेने की व्यवस्था नगर निगम के लिए फायदे का सौदा है। शहर में लगभग 5 लाख घर हैं। जिनसे नगर निगम 100 रुपए प्रत्येक घर के हिसाब से कचरा शुल्क लेता है तो उससे निगम को लगभग ५ करोड़ रुपए माह की आय होती है। जबकि निगम को कचरा घर-घर से उठाने से लेकर ट्रेचिंग ग्राउंड तक ले जाने पर लगभग 2.२५ से 2.५० करोड़ रुपए का डीजल प्रतिमाह लगता है। जिसमें से बड़ा खर्चा जो कि लगभग 1.80 करोड़ रुपए डीजल घर-घर से कचरा लेने में लगता है। निगम को इसके अलावा लगभग ९० लाख रुपए ड्रायवर और कंडक्टर की तन्खवाह का खर्चा लगता है। इसके बाद भी निगम को प्रतिमाह 1 करोड़ रुपए का फायदा इससे होता है। इसी तरह से बल्क में कचरा उठाने पर नगर निगम को लगभग १.२५ करोड़ रुपए की आय होती है। इस काम के लिए निगम ने 70 गाडिय़ां लगा रखी हैं, जिनका मासिक खर्चा लगभग ६३ लाख रुपए हैं। इसमें भी निगम को सीधे 62 लाख रुपए तक की आय हो रही है। इसके अलावा नगर निगम को स्वच्छता उपकर के रूप में शहर से लगभग 3 करोड़ से ज्यादा की आय प्रतिमाह होती है। लेकिन नगर निगम द्वारा इस वसूली के लिए कोई सिस्टम खड़ा नहीं किया है, जिसके कारण पूरा पैसा इकट्ठा नहीं कर पा रहा है।

0 शहर में कचरे के निपटारे की जो व्यवस्था हमने जनता के सहयोग से खडी की है, उसे हम बर्बाद नहीं होने देंगे। शहर की सफाई को बनाए रखने के लिए अफसरों को निर्देश दिए हैं, साथ ही सफाई के काम में कसावट लाने और काम नहीं करने वालों को बाहर करने के लिए भी मैंने निर्देश जारी किए हैं।
- मालिनी गौड़, महापौर

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