आजाद की शहादत देख आंखें हुईं नम, अव्यवस्थाओं और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार ने सोचने पर किया मजबूर

INDORE NEWS : अभिनव कला समाज में प्रयास थ्रीडी द्वारा नाटक ‘मैं आजाद’ तो सहस्त्रधार ग्रुप की ओर से विक्टोरिया लाइब्रेरी में ‘27 फरवरी’ और ‘लम्पट’ नाटकों का हुआ मंचन

इंदौर. शहर में दो संस्थाओं ने तीन नाटकों का मंचन किया, जिनमें आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों के योगदान से लेकर समाज में व्याप्त अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, लोगों की दोहरी मानसिकता, असंवेदनशीलता, बेरोजगारी तक का मंचन किया गया। इन तीनों नाटकों ने दिखा दिया कि आजादी के लिए हमारे क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दे दिया और आज उसी देश को अपने स्वार्थों के चलते लोग किस दिशा में ले जा रहे हैं। कुल मिलाकर कहें, तो शनिवार को एक ओर जहां चंद्रशेखर आजाद की शहादत देखकर आंखें नम हुईं, तो वहीं दूसरी ओर समाज में व्याप्त अव्यवस्था ने सोचने पर मजबूर कर दिया। अभिनव कला समाज में प्रयास थ्रीडी द्वारा वरुण जोशी लिखित नाटक मैं आजाद तो सहस्त्रधार ग्रुप की ओर से विक्टोरिया लाइब्रेरी में मोहन थानवी द्वारा लिखित ‘27 फरवरी’ और दूसरा ख्यात नाटककार नाग बोडस की लिखी हुई आखरी कृति ‘लम्पट’ का मंचन किया गया।
आजाद के आजादी के सपने से हुए रूबरू
चंद्रशेखर आजाद के शहादत दिवस पर मंचित इस नाटक का निर्देशन राघव ने किया। कहानी आजाद के बचपन से शुरू होती है, जब वे खेलते-खेलते एक पेड़ के पास आ जाते हैं। इस पेड़ का नाम देश वृक्ष है। आजाद देखते हैं, कुछ लोग उसे काटने, तोडऩे में जुटे हुए हैं तो वे शपथ लेते हैं, अपनी उम्र भर इस वृक्ष की रक्षा करेंगे। नाटक में बताया गया कि कैसे आजाद 14 साल की उम्र में ही देश की सेवा के लिए गिरफ्तार किए गए थे और कैसे उन्होंने वंदे मातरम कहते हुए जल्लाद गुंडा सिंह के 15 कोढ़े भी हंसते-हंसते सहे थे। आजाद के अज्ञातवास से लेकर आजादी के लिए उनकी हर लड़ाई को इसमें दिखाया गया। नाटक की शुरुआत और अंत एक डॉयलॉग से होता है, जिसमें आजाद अपनी मां से पूछते हैं. चंद्रशेखर का मतलब क्या होता है, तब मां कहती है कि जिसने मस्तक पर चांद धारण किया है, वह चंद्रशेखर है और आजाद के शहीद होने पर जब उनकी मां यह कहती है, उस समय आजाद के मस्तक पर बंदूक रखी होती है। नाटक में चंद्रशेखर आजाद के जीवन के अलग-अलग अवस्थाओं की भूमिका पार्थ, दिव्यांश शर्मा और अश्विन वर्मा ने निभाई।

आजाद की शहादत देख आंखें हुईं नम, अव्यवस्थाओं और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार ने सोचने पर किया मजबूर

27 फरवरी
यह एकल नाटक 20 साल के युवा हरुमल की कहानी है, जिसके पिता ने उसे 16 साल की उम्र में गोधरा रेलवे स्टेशन के बाहर लोकुमल की चाय की दुकान पर काम के लिए छोड़ दिया था। जहां वह मालिक के साथ दिन-रात काम में लगा रहता था। लोकुमाल भी हरुमाल को अपने बेटे जैसे ही रखते थे, क्योंकि वे खुद भी रोजगार के लिए गांव छोडक़र गोधरा में अपनी बीवी और बेटे से 16 साल से दूर थे, लेकिन 16 साल बाद लोकुमाल अपनी बीवी और बेटे से मिलने के लिए गोधरा रेलवे स्टेशन से रवाना होते हैं, लेकिन 2002 में हुए गोधरा रेल हादसे में उनकी बहुत ही वीभत्स मृत्यु हो जाती है। इससे हरुमाल बहुत ही ज्यादा विचलित हो जाता है और उसे पागल घोषित कर पागलखाने में डाल दिया जाता है।
देश की राजनीतिक व सामाजिक स्थितियों को दर्शाया
यह नाटक देश की राजनीतिक व सामाजिक स्थितियों को दर्शाता है। शुरुआत पागलखाने के एक दृश्य से होती है, जिसमें हरुमाल एक खत लिखने का प्रयास करता है। इस खत के जरिए ही देश, समाज, राजनीति, नियम, रोजगार,गरीबी और इंसानियत पे तीखे तंज कसता है। एक निर्देशक के रूप में तपन शर्मा सफल रहे हैं। हरुमाल के रूप में गौरव भावसार थे। संगीत आकाश अग्निहोत्री का रहा। प्रकाश व्यवस्था कनक अवस्थी की थी।
प्रमुख संवाद
- हमें पता है हमारा ये लिखा हुआ खत इस मानसिक रोग चिकित्सालय से निकलने से पहले सेंसर होगा, लेकिन हम ये भी जानते हैं कि संवेदनाओ को सेंसर करना अभी संवेदनहीन लोगों को नहीं आता।
-हम कहीं इस दुनिया में इतनी भी नफरत न फैला दें कि इस दुनिया में आने वाला बच्चा भी इस दुनिया में आने से नफरत करने लगे।

आजाद की शहादत देख आंखें हुईं नम, अव्यवस्थाओं और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार ने सोचने पर किया मजबूर

लम्पट
यह एक ऐसे तिलकधारी की कहानी जो पॉलिटिकल साइंस में एमए होने के बावजूद भी नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। अंत में वह सबसे ज्यादा संवेदनशील मुद्दे धर्म को ही अपना रोजगार और अपने कमाई का साधन बना लेता है। अपनी एक धार्मिक संस्था भी बना लेता है जिसके खाते में चंदे के नाम पर लाखों रुपए जमा होते हैं। यह नाटक कालेधन, देश की अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को गंभीरता के साथ उठाता है। मंच पर ऋषि दाधीच ने सफल अभिनय किया। तपन शर्मा गंभीर मुद्दों को सार्थक रूप से दर्शकों तक पहुंचाने में सफल रहे। संगीत कनक अवस्थी का था।
प्रमुख संवाद
-भला हो हमारी दोहरी अर्थव्यस्था का जो पूरे देश की तरह हमारे नगर में भी काले धन की मौजूदगी दर्ज करती है और भला हो हमारी नीतियों का जो मुझ जैसे लम्पटों की कमी नहीं रहने देती।

राजेश मिश्रा
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