दयाशंकर की डायरी में असल जिंदगी और ख्वाबों के बीच उलझे आम आदमी का संघर्ष

Indore News : कुंती माथुर स्मृति नाट्य समारोह में दो एकल नाटकों की प्रस्तुति। अदम गोंडवी की कविता ‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’ पर केंद्रित नाटक सरजू पार की मोनालिसा खेला गया। दूसरा नाटक नादिरा जहीर बब्बर लिखित ‘दयाशंकर की डायरी’ खेला गया।

इंदौर. सूत्रधार की ओर से आयोजित तीन दिनी कुंती माथुर स्मृति नाट्य समारोह का शुभारंभ शुक्रवार को हुआ। पहले दिन रायपुर की संस्था अभिनट फिल्म एंड नाट्य फाउंडेशन ने दो एकल नाटक प्रस्तुत किए। पहला नाटक अदम गोंडवी की कविता ‘मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’ पर केंद्रित सरजू पार की मोनालिसा खेला गया। दूसरा नाटक नादिरा जहीर बब्बर लिखित ‘दयाशंकर की डायरी’ खेला गया।
‘दयाशंकर की डायरी’ नाटक छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे से निकलकर मुंबई आए युवक के भीड़ में गुम होते सपनी की वास्तविकता को दिखाता है। जब दयाशंकर गांव से निकलता है तो उसे फिल्मों में काम मिलना आसान लग रहा था, लेकिन वास्तविकता ने उसे झकझोर कर रख दिया। एक विधायक के यहां नौकरी की तो उसकी बेटी से प्यार हो गया, मगर एकतरफा प्यार को मंजिल नहीं मिली। दयाशंकर पहले अवसाद में जाता है फिर पागल हो जाता है। इस नाटक की खासियत यह थी कि इसके संवाद छत्तीसगढ़ी भाषा में ही थे। छत्तीसगढ़ी परिवेश को प्रभावी रूप से दिखाया गया है। इसमें बीच-बीच में बलिहारी नार नटके और गौरिया साहब चल दिन, तब करिया साहब आईन जैसे छत्तीसगढ़ी गीतों का प्रयोग भी किया गया जो दर्शकों को गुदगुदाते हैं। एक आम आदमी कभी अपनी जिदंगी की जद्दोजहद से जूझ रहा होता है तो कभी अपने सपनों को जीने की कोशिश करने लगता है। कई बार वह असल जिंदगी व ख्वाबों के बीच उलझकर रहा जाता है। आम आदमी की इस ज²ोजहद को रवि शर्मा ने अपने अभिनय के माध्यम से बड़ी गहराई के साथ दिखाया है। क्षेत्रीय भाषा पर उनकी पकड़ और उच्चारण की स्पष्टता उनकी अभिनय क्षमता को दर्शाती है। योग मिश्र ने दोनों ही नाटकों का सटीक निर्देशन कर अपनी क्षमताओं परिचय दिया है। शहर में दयाशंकर की डायरी नाटक पहले भी मंचित हुआ है लेकिन छत्तीसगढ़ी में संवाद सुनना दर्शकों के लिए भी एक नवीन अनुभव था। योग मिश्र के इस प्रयोग को सराहा गया।
बलात्कार पीडि़ता और उसके परिवार के संघर्ष को मुखर कर गया 'सरजू पार की मोनालिसा'
सरजू पार की मोनालिसा नाटक एक दलित युवती की कहानी कहता है, जो गांव के एक दबंग परिवार के लडक़े द्वारा बलात्कार का शिकार हुई है। इस त्रासदी का शिकार होने के बाद युवती को सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। जब लडक़ी का पिता न्याय की गुहार लगता है तो उसका घर जला दिया जाता है। भाई जब अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है तो उसे जेल भेज दिया जाता है। अंत में न्याय मिल पाता है। नाटक न्याय व्यवस्था और बलात्कार पीडि़ता के प्रति समाज के रवैये पर एक सवाल खड़ा करता है। नाटक में संजीव मुखर्जी का प्रभावी अभिनय दर्शकों के दिलों को छू लेता है। २० मिनट के इस नाटक में भाव-भंगिमाओं और अंग संचालन ने नाटक को जीवंत रूप प्रदान किया। संजीव मुखर्जी एक बलात्कार पीडि़ता का दर्द बयां करने में सफल हुए।

राजेश मिश्रा Desk
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