scriptInflation hit even on animal feed | पशु आहार पर भी महंगाई की मार | Patrika News

पशु आहार पर भी महंगाई की मार

-1000 रुपए क्विंटल तक पहुंचा, पिछले साल आधे थे चारे के दाम
-गेहूं से आधी कीमत में बिक रहा भूसा
-जिलाबंदी रही तो आने वाले दिनों में कीमतों में और हो सकता इजाफा

इंदौर

Published: April 30, 2022 11:18:57 am

इंदौर (मनीष यादव). फसलों से निकलने वाले भूसे की कीमत अब मूल अनाज गेहूं की कीमत से आधी तक पहुंच गई है। सीजन में जहां भूसे की कीमत 400 रुपए क्विंटल रहती थी। वहीं अब इसकी कीमत लगभग ढाई गुना होकर 1000 रुपए हो गई है। अगर भूसे और चारे की जिलाबंदी के हालात यही रहे तो आने वाले दिनों में इसकी कीमत और बढ़ेगी। हालात यह हो गए कि ग्वाला कॉलोनी में 16 पशु पालक बचे हैं। उनमें से भी कुछ काम समेटने की सोच रहे हैं।
पशु आहार पर भी महंगाई की मार
पशु आहार पर भी महंगाई की मार

रोक ने बढ़ा दिए भाव
भूसा व्यापारी बाबू राजौरिया ने बताया कि इंदौर जिले में गेहूं का उत्पादन कम होने से यहां पर भूसा कम निकलता है। जो निकलता है, उसे स्थानीय किसान अपने पशुओं के लिए रख लेते हैं। इंदौर में भोपाल, विदिशा, हरदा और इस बेल्ट के दूसरे जिलों से भूसा आता है। यहां जिलाबंदी हो गई है। वहां का चारा और भूसा बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। इसके चलते कीमत लगभग दो गुना से ज्यादा हो गई है।

कृषि मंत्री को सौंपा ज्ञापन
भूसा व्यापारी व दलाल एसोसिएशन अध्यक्ष संजय कटारिया ने बताया कि इंदौर में दूध सप्लाय अब दूसरे जिलों पर निर्भर हो गया है। भूसे की जिलाबंदी के कारण ये संकट खड़ा हुआ है। कीमतें बढ़ रही हैं। इसको लेकर कृषि मंत्री कमल पटेल को ज्ञापन सौंपा है। जल्द ही जिलाबंदी की बाध्यता खत्म होने की उम्मीद है। इस कारण भूसे का संकट खड़ा हो गया है। पहले ही दूसरी फसलों के कारण उत्पादन घटा है। निमाड़ में मिर्च और कपास पैदा हो रहा है। वहां की पूर्ति भी इंदौर के बाजार को करना पड़ेगी। जिलाबंदी रही तो यहां भी माल नहीं आएगा तो आगे कहां से जाएगा। यह राष्ट्रीय समस्या बन गया है। पशुओं को लेकर भी नीति बनना चाहिए।

गेहूं, चना व मसूर का भूसा
पशुओं के लिए तीन तरह से अनाज का भूसा इस्तेमाल किया जाता है। इनमें मुख्य तौर पर गेहूं, चना और मसूर हैं। बरसात में भंडारण के लिए गेहूं और चने का भूसा ही पशु पालक लेते हैं। बरसात में मसूर के भूसे में कीड़े पडऩे की समस्या रहती है। फसल काटने के लिए मजदूर नहीं मिलने के कारण अब थे्रशर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके चलते इसका उत्पादन 40 प्रतिशत कम हो गया है।

बीयर फैक्टरी से मिल रहा सस्ता
बीयर बनाने के बाद जो अनाज बचता है, वो पशु चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। कई पशु पालकों ने अब बीयर फैक्टरियों से निकलने वाले वेस्ट मटेरियल को खिलाना शुरू कर दिया है। वहां से यह सस्ते दामों पर मिल रहा है। इसके चलते पशु पालकों में बीयर का बाटा लोकप्रिय हो रहा है। हालांकि कुछ पशु पालकों का मानना है कि इसे खिलाने से अभी तो दूध का उत्पादन बढ़ जाता है, लेकिन धीरे-धीरे जानवरों की हालत बिगडऩे लगती है। समय के साथ दूध का उत्पादन कम हो जाता है और बीमारी अलग लग जाती है।

पिछले साल 400 रुपए क्विंटल खरीदा
भैयाश्री गोशाला केंद्र बावड़ीखेड़ा कन्नौद (देवास) के संचालक इंदौर निवासी श्याम मेवाड़ा ने बताया कि हमारे यहां 30-35 गायें हैं। मैंने पिछले साल 400 रुपए क्विंटल के भाव से भूसा खरीद कर भर लिया था। इस साल अब तक खरीदी नहीं की है, लेकिन इसके भाव बढ़े हुए जरूर हैं। हमारी अधिकतर चारे की पूर्ति वैसे गांव व खेती से निकले चारे से हो जाती है, बाकी खरीदना पड़ता है।

16 पशुपालक ही बचे ग्वाला कॉलोनी में
पशु पालक मुकेश कुमायूं ने बताया कि बरसात से पहले पशु पालक भूसा भरकर रख लेते हैं। थोक भाव 400 रुपए तक रहता था। अब 1000 से 1100 रुपए तक मिल रहा है। ऐसे में लागत बढ़ जाएगी। एक पशु को एक साल में 30 क्विंटल तक भूसा लगता है। इसके अलावा दूसरा बाटा भी रहता है। लगातार बढ़ती कीमतों के कारण कई पशु पालकों ने तो जानवर बेच दिए हैं और दूसरे कामों में लग गए हैं। ग्वाला कॉलोनी में अब 16 पशु पालक ही बचे हैं। अगर भूसे के आने पर रोक लगी तो आने वाले दिनों में कीमत और बढ़ जाएगी। इसके साथ ही पशु पालकों की मुसीबतें भी।

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