Kargil vijay diwas : दुश्मन की नाक के नीचे से हम ‘बैट्री’ ले गए और उनके छक्के छुड़ा दिए

विशेष साक्षात्कार: कारगिल युद्ध में कमांडिंग ऑफिसर रहे कर्नल निशित कुमार ने पत्रिका से साझा किए अपने अनुभव

रीना शर्मा विजयवर्गीय @ इंदौर. 28 अप्रैल 1999, कश्मीर रेंज में हमारी फायरिंग की प्रैक्टिस चल रही थी। तभी हमें मैसेज मिला कि एक बैट्री (एक बैट्री में 6 तोपें होती हैं) लेकर सुबह ही कारगिल मूव करो। तब हमें पता चला कि पाकिस्तानियों ने घुसपैठ कर दी है। हम पूरी रात जवानों की हौसला अफजाई करते रहे और सुबह होते ही निकल गए।

कारगिल युद्ध में कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) रहे कर्नल निशित कुमार माथुर ने पत्रिका से 20 साल पुरानी उस गौरवपूर्ण लड़ाई के अनुभव साझा करते हुए बताया कि तब मैंने पलटन को लीड किया था। युद्ध में 26 जुलाई 1999 को विजय मिली, लेकिन लड़ाई मई के दूसरे सप्ताह में ही शुरू हो गई थी।

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वे बताते हैं, तोलोलिंक हो या टाइगर हिल इन सभी लड़ाई में हमारे तोपखानों का महत्त्वपूर्ण रोल रहा। इस बैट्री में 3 ऑफिसर्स और 120 जवान गए थे। सभी ने बहुत ही दिलेरी से युद्ध में हिस्सा लिया। फायरिंग के दौरान किसी ने भी अपनी जान की परवाह नहीं की।

कर्नल माथुर बताते हैं, युद्ध के दौरान मेरी एक बैट्री कश्मीर के गुरेद सेक्टर में पहुंची। उस दौरान दुश्मन पहाड़ पर थे और हम पूरी बैट्री को रात के अंधेरे में उनकी नाक के नीचे से निकालकर ले गए। एक तरफ किशनगंगा नदी की खाई थी और दूसरी तरफ पहाड़। ऐसे कच्चे रास्ते से हम जीत वाले रास्ते की ओर बढ़ रहे थे। हमारी पलटन के पांच जवानों को दुर्गम रास्ते पर जाने के लिए आर्मी कमांडर की ओर से प्रशंसा पत्र भी मिला था।

कर्नल माथुर वर्ष 2010 में हुए रिटायर्ड

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शहर के बापट स्क्वेयर पर रहने वाले कर्नल माथुर वर्ष 2010 में रिटायर्ड हुए। वे अब समाजसेवा में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया, जब मैं स्कूल में था तब से सोचा करता था कि मुझे देश का रक्षक बनना है। मेरा ये सपना जल्द पूरा भी हो गया। ग्रेजुएशन के बाद ही मैं सीधे सेना में भर्ती हो गया। ईश्वर की कृपा रही कि कारगिल युद्ध में भी मुझे अपनी टीम के साथ सेवाएं देने का मौका मिला।

घायल होने के बावजूद लड़ते रहे मेजर पुंडे

कर्नल माथुर गर्व से कहते हैं कि मेरी पलटन में कोई शहीद नहीं हुआ। केवल एक जवान को स्प्रिंटर लगा था और वह कोमा में चला गया। बाद में वे रिकवर हो गए। बैट्री कमांडर मेजर नितिन पुंडे तब ऑब्जर्वेशन ऑफिसर थे। वे तोपखानों की फायर डायरेक्ट करने के लिए 18 गे्रनेडियर्स के साथ गए थे। उन्हें गहरी चोट आई थी। इसके बावजूद वे लड़ते रहे। इस बहादुरी के लिए उन्हें सेना मेडल से पुरस्कृत किया गया था। इसके बाद हमने हायर रेंजर लगाकर पाकिस्तानी कैंप को नष्ट कर दिया।

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रीना शर्मा Desk
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