किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने भीगी पलकों से कहा- हम भी आपके आंगन की तुलसी

किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने भीगी पलकों से कहा- हम भी आपके आंगन की तुलसी

Reena Sharma | Publish: Mar, 17 2019 12:36:05 PM (IST) Indore, Indore, Madhya Pradesh, India

किन्नर सभ्यता, संस्कृति और साहित्य : चिंतन और चुनौतियां’ पर सेमिनार, संघर्ष से मिले मानवीय-संवैधानिक अधिकार व ट्रांसजेंडर को पहचान

इंदौर. सनातन काल से किन्नरों को उपदेवता का दर्जा मिला है, लेकिन समाज ने इसे छीनकर किन्नरों को उपहास और बेबस जिंदगी उपहार में दे दी। मेरा प्रयास है, किन्नर समाज को इस अंधेरे से निकालकर नए उजाले में लाऊं। मैंने संघर्ष किया और खुशी है इसमें बहुत हद तक सफल हुई हूं। भारत में किन्नरों को मानवीय और संवैधानिक अधिकार मिले हैं। अब भारत में ट्रांसजेंडर की अपनी पहचान है।

यह बात किन्नर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने कही। वे श्री अटलबिहारी वाजपेयी शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा ‘किन्नर सभ्यता, संस्कृति और साहित्य : चिंतन और चुनौतियां’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं। अध्यक्षता कॉलेज प्राचार्य डॉ. वंदना अग्निहोत्री ने की। विशेष अतिथि किन्नर संघ भोपाल की अध्यक्ष देवी रानी, पत्रकार आत्माराम शर्मा एवं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे रहीं। त्रिपाठी ने कहा, मैंने किन्नर अखाड़ा की स्थापना की तो कहा गया आपको मान्यता नहीं देंगे। मैंने कहा, मुझे जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, आपको किन्नरों को मनुष्य समझकर मान-सम्मान देकर तिरस्कार का भाव छोडऩा पड़ेगा। यदि तिरस्कार होता रहा तो किन्नर बधाई लेकर सडक़ों पर भीख मांगकर ही उपेक्षा के बीच जीवन गुजारते रहेंगे।

मेरा संघर्ष इसी को लेकर है कि मेरी और मेरे समाज की डिग्निटी इतनी सस्ती नहीं समझी जाए। इस देश का दुर्भाग्य है कि महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया और हम तीन तलाक पर अटके हुए हैं। सेमिनार संयोजक डॉ. कला जोशी ने कहा, आज किन्नर सभ्यता के हाशिए पर हैं। वे अपना हक, पहचान मांग रहे हैं। कब तक बधाई गीत गाकर शगुन के सहारे जिंदगी बिताएंगे?

हम भी आपके आंगन की तुलसी

समापन सत्र की मुख्य अतिथि किन्नर संघ भोपाल की अध्यक्ष देवी रानी और विशेष अतिथि साहित्यकार डॉ. निर्मला भुराडिय़ा एवं पंछी दीदी थीं। दीदी ने भीगी पलकों से कहा, हम भी आपके आंगन की तुलसी हैं, हमें भी प्यार के जल से सिंचिए। समाज की घृणा के थपेड़ों से नई पीढ़ी को बचाएं। डॉ. भुराडिय़ा ने कहा, समाज आज खुद से सवाल पूछे कि आखिर किन्नरों को पनी बस्ती अलग बसाकर क्यों जीवन-यापन करना पड़ता है? उन पर साहित्य लिखने के बजाय नुक्कड़ नाटक, डॉक्यूमेंट्री, सोशल मीडिया से जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।

किन्नर समाज का अभिन्न अंग : प्रो. डेट - स्लोवाकिया के प्रो. डेट ने कहा, किन्नर हमारी तरह समाज का अभिन्न अंग हैं। उन्हें भी गरिमा में जीवन जीने का अधिकार है। आभार डॉ. कला जोशी ने माना।

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