LIVE :फेमस है यहां की रंगपंचमी, श्रीकृष्ण कर रहे हैं मिसाइलों से रंगों की बौछारें

LIVE :फेमस है यहां की रंगपंचमी, श्रीकृष्ण कर रहे हैं मिसाइलों से रंगों की बौछारें
Live updates of rang panchami 2017 celebration

गेर की मस्ती में हुड़दंग कर रंग में भंग घोलने वालों से निपटने के लिए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के तमाम इंतजाम कर लिए हैं।


इंदौर.
रंगपंचमी पर निकलने वाली पारंपरिक गेरों का कारवां शुक्रवार को शहर की हृदय स्थली राजबाड़ा पहुंचने के लिए निकली। चार गेरों के साथ दो फाग यात्रा में हजारों लोग रंगों की मस्ती में डूबेंने के लिए शामिल हो रहे हैं।
गेर में मस्ती का रंग घोलने के लिए आयोजकों ने संगीत के साथ काफिले में रंग, पानी, गुलाल, फूलों और गुलाल उड़ाने के लिए तमाम इंतजाम किए हैं। यात्राओं में सामाजिक संदेश देने का प्रयास भी किया गया है। इस रिवाज की शुरुआत करीब 70 साल पहले हुई थी। गेर की मस्ती में हुड़दंग कर रंग में भंग घोलने वालों से निपटने के लिए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के तमाम इंतजाम कर लिए हैं।

रंगों का कारवां

टोरी कॉर्नर
समय :  सुबह 10.30 बजे
स्थान : टोरी कॉर्नर
वर्ष : 70वां

मॉरल क्लब
समय : सुबह 10.30 बजे
स्थान : मल्हारपल्टन
वर्ष : 45वां



हिंद रक्षक फाग यात्रा
समय : सुबह 10 बजे, स्थान : बद्रीनारायण मंदिर, वर्ष : 20वां

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रसिया कॉर्नर
समय : सुबह 10 बजे
स्थान : ओल्ड राज मोहल्ला
वर्ष : 44वां



संगम कॉर्नर
समय : सुबह 10.30 बजे
स्थान : संगम कॉर्नर गली-1
वर्ष : 62वां

 उड़ती उमंगों पर झूम रही टोली
सत्यनारायण सत्तन, राष्ट्रीय कवि
नारी के अंगों, फूलों के रंगों पर
उड़ती उमंगों पर झूम रही टोली है।
खानदानी नंगों पर, बड़े-बड़े भिकमंगों पर
बेढंगे ढंगों पर, हो रही ठिठोली है।
नारी के संग अत्याचार, हत्या व बलात्कार
लूट, ठगी, भ्रष्टाचार, रंगों की झोली है।
एेसा कैसे वसंत, बेटी का दुखद अंत
और कहते हैं, होली है, होली है।
मुर्गी का अंडे से झंडे का डंडे से
पंडे का कंडे से, नाता पुराना है।
पान का सुपारी से, ताश का जुआरी से
कुंअर का कुंआरी से, रिश्ता मिलाना है।
होंठों का लाली से, दारू का प्याली से
जीजा का साली से, मिलने का बहाना है।
कुर्सी पर डटे हुए, जाजम पर सजे हुए
रंग भरे क्षणों में अब होली मनाना है।



राजस्थानी पगड़ी और मुठ्ठी भर-भर गुलाल
मल्हारगंज के जगदीश शर्मा गेर में वैसे तो हर साल अलग-अलग स्वांग में रहते हैं। राजस्थानी साफा या टोपी उनकी पहचान है। वे टोपी लगाकर कंधे पर झोली टांगकर उसमें गुलाल भर लेते हैं। जब भी किसी से मिलते हैं तो मुट्ठीभर गुलाल से उसका स्वागत करते हैं। शर्मा का कहना है, इस अंदाज से कई बार एेसी पहचान हुई जो बाद में दोस्ती में बदल गई। यह सिलसिला आज भी जारी है।



हंसी-ठिठोली से गुदगुदाती है मसखरों की टोली
व्यवसायी जयेश पंचोली की कहानी बहुत रोचक है। गेर में शामिल होते ही लोग उन्हें रंग देते थे। इसके बाद कोई उन्हें पहचानता ही नहीं था। अपनी अलग पहचान बनाने के लिए उन्होंने अलग ही तरीका निकाला, माथे पर रूमाल बांधकर फक्कड़ अंदाज में मैदान संभालते हैं। खूब हंसी-ठिठोली कर दोस्तों के संग रंग जमाते हैं। उनका कहना है, एेसा करने से बहुत मजा आने लगा। अपने अंदर की रचनात्मकता बाहर आने लगी। पहले तो मन में कुछ आता भी था, लेकिन अब झिझक दूर हो गई है।



कृष्ण के वेश में बरसाते हैं पिचकारी से प्रेम रंग 
लोधीपुरा क्षेत्र में रहने वाले मयंक वर्मा हर साल फाग यात्रा में शामिल होते हैं। वे कृष्ण का वेश धारण कर जाते हैं। अभी पढ़ाई कर रहे हैं। मयंक का कहना है, भगवान के स्वरूप में रह कर रंग बरसाने का मजा कुछ अलग होता है। सभी की नजरों का आकर्षण बन जाते हैं। रंगों की बौछार के लिए जब आसपास से आवाजें आती हैं तो समझ नहीं आता किस ओर कितना रंग बरसाएं। मन करता है, एक बार नीचे रहकर भी तो बौछारों का मजा देखें।



सामयिक वेश में लोगों के साथ मजा
चतुरलाल मदनपुरिया का अंदाज अलग होता है। कपड़ों पर प्रेस करने वाले मदनपुरिया की जिंदगी के रंग रंगपंचमी की गेर में नजर आते हैं। उन्होंने बताया, गेर में हर बार अलग स्वांग रचता हूं। विषय सामयिक होता है, पिछले साल केजरीवाल का और उससे पहले सब्जी वाले का स्वांग रचा था। इस बार पांच राज्यों के चुनावों में सफलता के किरदारों को जीवंत करूंगा।

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पागल बाबा की पहचान निराली 
गेर में अपने आप का मजाक बनाकर भी मजा लेने का अंदाज है। इसके लिए कोई फूहड़ अंदाज में रहता है तो कोई जोकर बनकर लोगों के मन को बहलाता है। मालगंज पर फोटोकॉपी की दुकान चलाने वाले दिलीप जोशी की पहचान गेर में एक पागल बाबा के किरदार के रूप में बनी हुई है। रंग-बिरंगी ड्रेस पहनकर हाथ में झाडू या कुछ वस्तु लेकर पूरे समय गेर में अपने अंदाज में ही मस्ती करते हैं। उनका कहना है, साल भर तक तो काम करते हैं। होली के इन्हीं दिनों मंे एेसे आइडिया से एक अलग मजा मिलता है। लोग अपनी ओर आकर्षित होते हैं।

कभी भूत तो कभी मंगल ग्रह का निवासी
राजमोहल्ला निवासी राकेश ठाकुर पेशे से टेलर हैं। सालभर टेलरिंग करते हैं। वे कहते हैं, होली एक एेसा त्योहार है, जो हमें अपने ढंग से मस्ती में मस्ताने के लिए प्रेरित करता है। साल में यही एक दिन एेसा होता है, जिस दिन कुछ अलग करने को मन करता है। रंग और भंग की तरंग ही कुछ एेसी होती है। अपने अंदर का कलाकार बाहर आ जाता है। रंगपंचमी की गेर मंे सालों से कभी भूत तो कभी डरावना रंग रखकर लोगों का मनोरंजन कर रहा हूं। इस वेश के साथ हर साल एक अलग संदेश देने का प्रयास करता हूं।




इमरजेंसी में भी नहीं रुका कारवां
गेर का रंग धीरे-धीरे एेसा जमता गया कि इसके लिए स्थानीय प्रशासन को छुट्टी घोषित करना पड़ती है। आपातकाल में भी गेर का सिलसिला नहीं टूटा। शहर की कई नामी हस्तियां अलग-अलग दौर में गेर से जुड़ीं। गेर का खुमार और लाल-पीला-हरा-नीला रंग उगलती तोपें। रंगों का खौफ एेसा कि गेर मार्ग पर क्या मकान और क्या दुकान, सब कुछ तिरपालों से ढंक जाता है। गेर के रास्तों खासकर सराफा और खजूरी बाजार में सबसे ज्यादा तिरपाल इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि गेर यहां शबाब पर होती है। यहां दुकानों के साइन बोर्ड तक कवर कर दिए जाते हैं। गेर के इस कारवां में स्व. बाबूलाल गिरि, छोटेलाल गिरि, स्व. बसंत पंड्या, स्व. गिरधरगोपाल राठी, स्व. लाड़लीप्रसाद सेठी, स्व. प्रहलाद शर्मा (मशीन वाले), स्व. रामचंद्र भिंडी पहलवान, स्व. गोकुलदास भूतड़ा, स्व. चांदमल गुप्ता (पूर्व महापौर), बाबू हमीद भाई, मो. शरीफ भाई, जब्बार हुसैन, बुंदू भाई आदि प्रमुख थे।
शेखर गिरि, टोरी कॉर्नर गेर संयोजक
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