... आखिर श्यामाचरण शुक्ला ने ही पार लगाई नैय्या

1967 में देश की राजनीति इस संक्रमण काल से गुजर चुकी है। गैर कांग्रेसी सरकार और मजबूत विपक्ष का नारा डॉ. राममनोहर लोहिया ने बुलंद किया और 1967 से 1972 के बीच प्रदेश की विधानसभा में जबरदस्त उठापठक हुई।

By: amit mandloi

Published: 11 Sep 2018, 02:14 PM IST

इंदौर. राजनीतिक घटनाक्रम हमेशा समय बदलने वाले होते हैं। इनकी शुरुआत छोटे-छोटे असंतोष से होती है। जिस गठबंधन राजनीति के भरोसे आज देश चल रहा है, वह भारतीय राजनीति में कोई नया अध्याय नहीं है। 1967 में देश की राजनीति इस संक्रमण काल से गुजर चुकी है। गैर कांग्रेसी सरकार और मजबूत विपक्ष का नारा डॉ. राममनोहर लोहिया ने बुलंद किया और 1967 से 1972 के बीच प्रदेश की विधानसभा में जबरदस्त उठापठक हुई। विधानसभा भंग होने की नौबत तक बनी। संविद सरकार ने प्रदेश को मध्यावधि चुनाव से बचाया। आखिर में दोबारा कांग्रेस सरकार के मुखिया बन कर श्यामाचरण शुक्ला ने ही नैय्या पार लगाई थी।

दरअसल, 1967 का दौर बहुत बदलाव वाला था। विपक्ष के अच्छे लोग विधानसभा में काबिज थे। इंदौर से मैं और आरिफ बेग सोशलिस्ट विधायक बने और पं. यज्ञदत्त शर्मा कम्युनिस्ट पार्टी समर्थित नागरिक समिति से विधायक बन कर असेंबली पहुंचे थे। कांग्रेस की सरकार बनी। डीपी मिश्र मुख्यमंत्री बने। करीब चार माह बाद विधानसभा सत्र शुरू हुआ और अलग-अलग मुद्दों पर बहस हुई। प्रदेश में शिक्षा के एक मुद्दे पर मत विभाजन की स्थिति बनी, जद्दोजहद और जोड़-जुगाड़ के बाद भी सरकार हार गई। मुख्यमंत्री मिश्र हाई कमान के पास पहुंच गए। बागी हुए कांग्रेसी विधायकों की मंशा बताते हुए विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर डाली। पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इसे नजरअंदाज कर दिया। इसी बीच कांग्रेस के बागी विधायक, जनसंघी और हम लोग दिल्ली पहुंच गए। संविद सरकार की मांग उठने लगी। आखिरकार संविद सरकार बनना तय हुआ और गोविंद नारायणसिंह मुख्यमंत्री बने। उस समय विधानसभा में हम समाजवादियों की संख्या 18 के लगभग हुआ करती थी। करीब डेढ़ साल तक तो सबकुछ ठीक चलता रहा, अचानक ही बागी कांग्रेसियों को फिर पार्टी ने वापस लेने का मन बना लिया। पासा पलट गया, सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। आदिवासी नेता राजा नरेशचंद्र को मुख्यमंत्री बनाया गया। इससे भी काम नहीं चला। आखिरकार कांग्रेस ने 14 दिन बाद अपने सभी विधायकों को राजी करके पार्टी की ओर से श्यामाचरण शुक्ल का नाम रखा, जिस पर सभी की सहमति बनी। उन्होंने विधानसभा का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद चुनाव हुए और कांग्रेस की ही दोबारा सरकार बनी, जो 1977 तक चली। हालांकि यह दौर भारतीय राजनीति का सबसे बदलाव वाला दौर रहा। जनता पार्टी का उदय हुआ था। बाद में प्रदेश में भी गैर कांग्रेसी सरकार बनी।

9 राज्यों में बनी थी संविद सरकार

डॉ. लोहिया ने उस समय विपक्षी दलों को एक करने के लिए गैर कांग्रेसी सरकार की रणनीति बनाई और प्रदेश सहित पूरे देश में गठबंधन नेतृत्व को आगे लाए। हालांकि यह प्रयोग बहुत सफल नहीं रहा, लेकिन प्रदेश मध्यावधि चुनाव से बच गया। तीन बार सरकारें बनी और टूटीं। आखिर में कांग्रेस की ओर से श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने। उसी दौरान उत्तर प्रदेश में चरण सिंह उभरे, बिहार में महादेव प्रसाद का नाम चला, हरियाणा, उड़ीसा सहित 9 राज्यों में संविद सरकार यानी विपक्ष की मदद से सत्ता पक्ष के बागियों की सरकारें बनीं।

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