आर्थिक तंगी में भी 2 साल पहले बने शौचालय तोड़ फिर बना रहे नए

शहर की सडक़ों के गड्ढों को भरने के लिए नगर निगम के पास नहीं हैं पैसे

By: रमेश वैद्य

Published: 29 Dec 2020, 07:52 PM IST

इंदौर. शहर की सडक़ों पर होने वाले गड्ढों को भरने के लिए नगर निगम के पास पैसे नहीं हैं। पुराने स्वीकृत काम ही नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि निगम आर्थिक तंगी बताकर ठेकेदारों को भुगतान नहीं कर रहा है, जिससे वे काम ही नहीं कर रहे हैं।
दूसरी ओर जनधन की बर्बादी में भी निगम पीछे नहीं है। इसी के चलते स्वच्छता सर्वेक्षण के तहत दो साल पहले ही जिन शौचालयों (मूत्रालयों) को तैयार किया था, उन्हें तोडक़र दोबारा बनाया जा रहा है। निगम ने खुले में शौच को रोकने के लिए 4 साल पहले बड़े स्तर पर पुराने शौचालयों को सुधारना शुरू किया था। ये काम 2018 तक चलता रहा। इस दौरान नए शौचलयों को बनवाने के साथ ही पुराने शौचालयों को भी सुधारा था। 400 शौचालयों को अपडेट कर बनाया था। इन शौचालयों के भीतरी हिस्से में ४ फीट तक टाइल्स, यूरिन शीट, बिजली, पानी की लाइन सहित पानी की टंकी पर लाखों रुपए खर्च किए। अब इन्हें तोडक़र नए सिरे से बनाया जा रहा है। इस बार स्वच्छता सर्वेक्षण की शर्तों के मुताबिक आदर्श शौचालयों की सुविधाओं वाले आदर्श मूत्रालयों का निर्माण होना है। इनमें वॉश बेसिन, केयरटेकर रूम सहित अन्य सुविधाएं होना चाहिए। मौजूद शौचालयों में से 10 फीसदी शौचालय इसी तरह के होना जरूरी है। इस हिसाब से इंदौर में 40 ऐसे नए शौचालयों का निर्माण होना है, लेेकिन शौचालयों में नई सुविधाएं जुटाने के नाम पर निगम के अफसरों ने नया खेल कर दिया है। अफसरों ने पूरे शौचालय ही तोडक़र नए सिरे से बनाने का काम शुरू कर दिया है, जबकि जो सुविधाएं जुटाना थी, उनको अलग से तैयार किया जा सकता था।
ये भी कर दिया खेल
निगम ने वाटर प्लस सर्वे की शर्तों के मुताबिक सभी शौचालयों में टूट-फूट को रिपेयर करने सहित अन्य व्यवस्था जुटाने के लिए निर्देश जारी किए थे। अफसरों ने इसमें भी खेल कर दिया। कुछ शौचालयों में जो पहले से ही सही थे, उनमें फर्श और टाइल्स टूटने के चलते रिपेयरिंग के नाम पर पूरे शौचालयों पर पत्थरों की टाइल्स लगवा दी। इसके जरिए इन्हें खूबसूरत बनाने का काम किया जा रहा है।
कई अभी भी दुर्दशा का शिकार
एक ओर शौचालयों को अपडेट करने के नाम पर पैसा खर्चा किया जा रहा है, जबकि कई पुराने शौचालयों की हालत खराब है। चिकमंगलूर चौराहे के पास स्थित दोनों शौचालयों, राजबाड़ा के पीछे की ओर मौजूद शौचालय, राजकुमार जीन से लगा हुआ शौचालय आदि में जहां न तो सही तरह से सफाई हो पा रही है, और न ही यहां पानी की व्यवस्था है।
जोनल अधिकारियों को करना था काम
शौचालयों को सुधारने और अपडेट करने के काम की पूरी जिम्मेदारी जोनल स्तर पर होना थी। इसकी मॉनिटरिंग का काम स्वच्छ भारत मिशन के तहत किया जाना है।
इन स्थानों पर तोड़े शौचालय

पोलोग्राउंड चौराहा : यहां एसएफ की जमीन से लगाकर चौराहे के नजदीक शौचालय था। यहां पानी की भी व्यवस्था थी। पास में खाली जगह थी, जिसमें केयरटेकर का रूम और अन्य सुविधाओं को अलग से जुटाया जा सकता था, लेकिन इसे पूरी तरह से तोडक़र नया बनाया जा रहा है। इस पर लगभग 5 लाख का खर्चा होगा, जबकि इससे महज 100 कदम की दूरी पर ही सुलभ शौचालय है, जिसमें ये सारी सुविधाएं हैं।
संस्कृत कॉलेज के पीछे (सुभाष मार्ग)
सुभाष मार्ग पर संस्कृत कॉलेज के पीछे इसकी दीवार से लगाकर निगम ने दो साल पहले ही शौचालय को अपडेट किया था। यहां पर सभी तरह की व्यवस्था पहले से ही थी। इसे भी अपडेट करने के नाम अंदर से पूरी तरह से तोड़ दिया है, जबकि पास में ही खाली जगह पर वॉशबेसिन, पानी की व्यवस्था सहित केयरटेकर रूम बनाया जा सकता था।

40 आदर्श शौचालय बनाने हैं
स्वच्छता सर्वेक्षण की शर्तों के मुताबिक हमें 40 आदर्श शौचालय बनाने हैं। चूंकि कुछ शौचालयों में दिक्कत थी, इसलिए उन्हें नए सिरे से बनाया जा रहा है। जहां जगह है, वहां तोड़-फोड़ नहीं कर रहे हैं।
अनूप गोयल, कार्यपालन यंत्री, स्वच्छ भारत मिशन

रमेश वैद्य Desk
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