ओम पुरी मानते थे थिएटर छोड़ना उनका गलत फैसला था, नसीर के बारे में रखते थे ये राय

बिंदास बोल और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले दिग्गज फिल्म अभिनेता ओमपुरी ने दिसंबर 2015 में  नाटक का मंचन किया था।

(फिल्म 'वेस्ट इज वेस्ट' के एक सीन में ओम पुरी.)

इंदौर। महान अभिनेता और पद्मश्री ओमपुरी का शुक्रवार की सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे 66 साल के थे। ओमपुरी न सिर्फ बॉलीवुड सिनेमा में अपनी बेमिसाल अदिकारी के लिए जाने जाते थे बल्कि उन्होंने पाकिस्तानी, ब्रिटिश और हॉलीवुड फिल्मों में भी उन्होंने यादगार अभिनय किया। 

अपने बिंदास बोल और बेबाक अंदाज के लिए जाने वाले ओमपुरी ने दिसंबर 2015 को इंदौर में एक नाटक का मंचन किया था। इस समय पत्रिका को दिए एक बेबाक इंटरव्यू में ओमपुरी ने साफ कहा था कि मैंने और नसीर ने ( नसीरुद्दीन शाह) कांप्रोमाइज किया बंसी ने नहीं। आइए हमारे साथ पढ़िए ओमपुरी का बेबाक इंटरव्यू -




खुद को कहते थे आर्टिस्ट
ओमपुरी ने पत्रिका के रिपोर्टर से बातचीत में कहा था कि " हम खुद को आर्टिस्ट कहते थे। कला का सच्चा पुजारक लेकिन सच यह है कि समय आने पर मैंने, नसिरूद्दीन शाह ने, एनएसडी से आए अन्य थिएटर आर्टिस्ट  ने क्रांप्रोमाइज कर लिया, बंसी ने नहीं। बंसी कौल हमारे बीच का सबसे बेहतरीन थिएटर आर्टिस्ट था। हम सभी ने ज्यादा पैसों के लिए सिनेमा का रुख कर लिया। बंसी लगातार थिएटर में अभिनय कर खुद की कला को मांजते रहे।"


आज उनका नाम देश के शीर्ष थिएटर आर्टिस्ट में शुमार है। थिएटर से अपनी दूरी को लेकर हम अक्सर कहा करते थे आजकल सिनेमा में भी अच्छा काम होता है। पीछे मुड़कर अब देखता हूं तो लगता है कि थिएटर छोडऩा हमारी सबसे बड़ी गलती थी। ओमपुरी  दिसंबर 2015 को अभिनव रंगमंडल के बंसी कौल पर केंद्रित रंग-बंसी में शिरकत करने इंदौर आए थे।



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फिल्मों से खफा
ओमपुरी आज की फिल्मों से बेहद खफा थे। उनका मानना था कि आज की फिल्मों से समाज गायब है। समाज के सवाल, गरीबी, किसान सब गायब हैं। अब ऐसी फिल्में नहीं बनती जो लोगों की आत्मा झिंझोड़ दें। अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम का सबसे खराब दौर चल रहा है।

सिनेमा की जरूरत
ओमपुरी का कहना था कि , एक तरफ हमें मनोरंजन के लिए 'जाने भी दो यारों' जैसी हल्की फुल्की फिल्मों की जरूरत है वहीं दूसरी तरफ 'आक्रोश' जैसी फिल्मों की भी जो आत्मा झंझोड़ सके।

थिएटर का पुत्र है सिनेमा
ओमपुरी मानते थे कि  थिएटर मां की तरह है। सिनेमा, टीवी और रेडियों उसके पुत्र हैं। सिनेमा जब शुरू हुआ तब लेखक से लेकर  अभिनेता सभी थिएटर से आए थे। थिएटर ही इन कलाओं का मूल है।
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Shruti Agrawal
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