RAHAT INDORI : कभी कोने में बैठकर सुनते थे मुशायरा, आज शेर-ओ-शायरी में बजता है इनका डंका

  • मुफलिसी से मकबूलियत तक...
  • आज की शाम डॉ. राहत इंदौरी के नाम
  • शेर-ओ-शायरी में मंच लूटते हो गए पचास वर्ष

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने पिछले दिनों अपनी अभिनय यात्रा के पचास बरस पूरे किए, वहीं शेरो-शायरी के ‘शेर’ हमारे अपने राहत इंदौरी को भी मंच लूटते पचास वर्ष हो गए। इसी खुशी को मनाने के लिए आज की रात ‘राहत’ की रात होगी, ‘राहत’ की ही बात होगी यानी जश्ने राहत मनाएगा इंदौर।

लोकेन्द्र सिंह चौहान @ इंदौर. देश-दुनिया में इंदौर को पहचान दिलाने वाले नामों की फेहरिस्त तैयार की जाए तो आपके जेहन में कौन-कौन से नाम आते हैं? सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर, अभिनेता सलमान खान, क्रिकेटर नरेन्द्र हिरवानी व राजेश चौहान, लोकसभा अध्यक्ष रहीं सुमित्रा महाजन, कवि सत्यनारायण सत्तन, संजय जगदाले, युवा गायिका पलक मुछाल, गीतकार स्वानंद किरकिरे आदि... ढेरों प्रतिभाएं व हस्तियां हैं, जिन्होंने इंदौर का नाम देश-दुनिया में रोशन किया है।

RAHAT INDORI : कभी कोने में बैठकर सुनते थे मुशायरा, आज शेर-ओ-शायरी में बजता है इनका डंका

इन्हीं में एक नाम और प्रमुखता से लिया जाता है, उनके नाम के साथ ही हमारे शहर का नाम भी जुड़ा हुआ है... जी हां, मकबूल शायर व मुशायरों-महफिल की शान हमारे अपने राहत इंदौरी। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने पिछले दिनों अपनी अभिनय यात्रा के पचास बरस पूरे किए, वहीं शेरो-शायरी के ‘शेर’ राहत इंदौरी को भी मंच लूटते हुए पूरे पचास वर्ष हो गए। इसी खुशी को मनाने के लिए आज की रात ‘राहत’ की रात होगी, ‘राहत’ की बात होगी यानी जश्ने राहत का आयोजन इंदौर में हो रहा है। इसमें इंदौर अपने पसंदीदा शायर का सम्मान करेगा।

RAHAT INDORI : कभी कोने में बैठकर सुनते थे मुशायरा, आज शेर-ओ-शायरी में बजता है इनका डंका

देशभर के नामी कवि व शायर अपनी बिरादरी के इस शीर्ष पुरुष के सम्मान समारोह में शिरकत करने आ रहे हैं। वे गवाह बनना चाह रहे हैं ‘राहत’ के उन पलों का जब इंदौरी उन्हें सिर-आंखों पर बिठाएंगे। शुरुआत में जनाब ने खूब संघर्ष किया। पेंटर हुआ करते थे। मालवा मिल क्षेत्र में साइन बोर्ड बनाया करते और कुछ-कुछ लिख कर यार-दोस्तों में सुनाते। पहली बार उन्होंने रानीपुरा में मुशायरा पढ़ा। यहां स्थित बज्म-ए-अदब लाइब्रेरी में अक्सर मुशायरे की महफिल सजा करती, राहत भी पहुंच जाते। एक तरफ बैठ सुनते-गुनते। एक दिन वहां मौजूद एक शायर की नजर उन पर पड़ गई। मंच पर बुला लिया और कहा कि आज तुम्हें मुशायरा पढऩा है, फिर क्या था! उन्होंने वो शेर सुनाए कि लोग उनके कायल हो गए। यहीं से शुरू हुआ सफर आज पचास ***** हो गया है। रानीपुरा-मालवा मिल से बढ़ते-बढ़ते पूरा शहर, देश, दुनिया उनके चाहनेवालों में शामिल हो गए। शुरुआत में वे रानीपुरा में एक दुकान पर बैठा करते थे, तब ही मकबूल हो गए थे।

RAHAT INDORI : कभी कोने में बैठकर सुनते थे मुशायरा, आज शेर-ओ-शायरी में बजता है इनका डंका

लोग इतना सलाम करते कि वे हाथ उठा-उठाकर थक जाते। रानीपुरा में ही बापू करके एक खोपरा पाक-नमकीन की दुकान हुआ करती थी। जब दुकान पर बापू नहीं रहते तो राहत ही किसी ग्राहक के आने पर भजिये-पापड़ तौल कर दे दिया करते। रानीपुरा से उनका गहरा ताल्लुक रहा है। इंदौर से बाहर मुशायरा पढऩे गए तब भी रानीपुरा व इंदौर का जिक्र जरूर करते हैं। रानीपुरा के लिए उन्होंने शेर भी कहा था और अक्सर मुशायरे में पढ़ा करते कि- सुखनवर ओटलों पर बैठते हैं/मेरी दिल्ली मेरा रानीपुरा है। वे आम आदमी को किस तरह से याद रखते हैं। उसका नमूना देखिए कि वे पहली बार पाकिस्तान गए, कराची में मुशायरा पढऩे। उनके संगी साथी ने कहा कि पाकिस्तान जा रहे हो तो वहां से मेरे लिए अहमद फराज की किताब ले आना।

वे सज्जन तो यह कहकर भूल गए कि इतना बड़ा शायर कहां ये बात याद रखेगा और किताब लाएगा लेकिन जब वे वहां से आए और उक्त सज्जन के दरवाजे पर स्कूटर खड़ा किया। डिग्गी में से किताब निकाली और उन्हें भेंट की तो वे देखते रह गए। राहत इंदौरी से जुड़े ऐसे तमाम वाकियात भी अब आपके सामने आएंगे, क्योंकि आज उन पर लिखी गई पुस्तक का विमोचन भी होने जा रहा है। आपका सफर यूं ही जारी रहे, हम पचासा नहीं, बल्कि सैकड़ा मनाएं। मिलनसार व हरदिल अजीज राहत की शान में उनका ही एक शेर, जो आज के युवाओं को भी आगे बढऩे के लिए प्रेरित करता है...

RAHAT INDORI : कभी कोने में बैठकर सुनते थे मुशायरा, आज शेर-ओ-शायरी में बजता है इनका डंका

रिवायतों की सफें तोड़ कर बढ़ो वरना
जो तुम से आगे हैं, वह रास्ता नहीं देंगे।

राहत की रात है...
डॉ. राहत इंदौरी के कुछ मशहूर शेर

न हम-सफऱ न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पांव का कांटा हमीं से निकलेगा

शाख़ों से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम
आंधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

वो चाहता था कि कासा खऱीद ले मेरा
मैं उसके ताज की क़ीमत लगा के लौट आया

मिरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे
मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

मैं आखिर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहां हर एक मौसम को गुजऱ जाने की जल्दी थी

घर के बाहर ढूंढता रहता हूं दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

मैं पर्बतों से लड़ता रहा और चंद लोग
गीली ज़मीन खोद के फऱहाद हो गए

ये हवाए उड़ न जाएं ले के कागज़़ का बदन
दोस्तों मुझ पर कोई पत्थर जऱा भारी रखो

तूफ़ानों से आंख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे
जो हो परदेस में वो किससे रज़ाई मांगे

अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे

आंख में पानी रखो, होठों पे चिंगारी रखो
जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है
आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन है

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे, सब खुल के आ गए

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूंगा उसे
जहां-जहां से वो टूटा है, जोड़ दूंगा उसे

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चांद पागल है, अंधेरे में निकल पड़ता है

हमसे पहले भी मुसाफिर कई गुजऱे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूं हैं

नींद से मेरा ताल्लुक ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यूं हैं

एक चिंगारी नजऱ आई थी बस्ती में उसे
वो अलग हट गया आंधी को इशारा कर के

इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है
नींदें कमरों में जागी हैं ख्वाब छतों पर बिखरे हैं

हम अपनी जान की दुश्मन को अपनी
जान कहते हैं, मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं

रीना शर्मा
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