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Russo-Ukraine War: यूक्रेनी जवानों ने जब भारतीय छात्रों पर तान दी थीं बंदूकें...

कीव, खारकीव समेत यूक्रेन के कई शहरों से इंदौर आए करीब 16 छात्र।

इंदौर

Updated: March 04, 2022 01:23:24 am

इंदौर. बम धमाकों के बीच जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर यूक्रेन से करीब 16 छात्र इंदौर पहुंचे। यहां उनके परिजनों ने उनका स्वागत किया। कुछ छात्रों के चेहरे पर भय अब भी साफ नजर आ रहा था। वहीं, अपने बच्चों को सुरक्षित पाकर माता-पिता के आंखों से खुशी के आंसू छलक आए। कुछ बच्चों के आंखों में सुरक्षित अपने वतन लौटने की खुशी के आंसू थे। जैसे ही बच्चे एयरपोर्ट से बाहर आए, भारत माता की जय के नारे गूंजने लगे। देवास सांसद महेन्द्र सिंह सोलंकी समेत कई जनप्रतिनिधि बच्चों को रिसीव करने पहुंचे थे। एयरपोर्ट पर बच्चों को माला पहनाकर स्वागत किया गया। मिठाई-चॉकलेट बांटी गई। कुछ देर दुलार करने के बाद सभी बच्चें अपने-अपने घर रवाना हो गए।
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ये छात्र आए इंदौर
इंदौर के प्रणय राव, ममता पाटीदार, आयुषी ठाकुर, दिव्यांशी जैन, राजश्री मौर्य, शाश्वत डोड़े, हरिओम चायल, शानू गेदा, अंजलि वेनीपुरी बुरहानपुर, रजत हिलाल धार, यशवर्मा धार, धनराज नागर देवास, हरिओम पाटीदार उज्जैन, अभिलाष मीणा डबल चौकी, प्रगति कोठी फोड़ा मंदसौर और फरहान शाह शाजापुर।
जवानों ने सिर पर रख दी बंदूक
यूक्रेन (Russo-Ukraine War) के लवी से हम करीब 50 किलोमीटर पैदल चलकर पोलैंड बॉर्डर पर पहुंचे, लेकिन हमे जाने नहीं दिया जा रहा था। आपत्ति लेने पर मेरे सिर पर यूक्रेन के जवान ने बंदूक रख दी, कहा- आगे नहीं जा सकते। 3 दिन भूखे-प्यासे रहकर हम लाइन में लगे रहे, लेकिन हमे जाने नहीं दिया गया। माइनस डिग्री तापमान होने से स्कीन इंफेक्शन हो गया। जब नहीं जाने दिया गया तो फिर हम वापस लवी लौटे, वहां से हम हंगरी के रास्ते भारत आए।
- प्रगति कोठीफोड़ा, मंदसौर
बमबारी के बीच बंकर में छिपकर बचाई जान
हम कीव में फंसे थे, यहां बमबारी हो रही थी। ऐसा लगा हम नहीं बच जाएंगे। तीन दिन तक बंकर में रहना पड़ा। इसके बाद जब सूचना मिली की निकल सकते हैं तो जैसे-तैसे ट्रेन से हम हंगरी बॉर्डर पहुंचे। कलर पेंसिल से तिरंगा बनाकर अपने पास रखा। पापा आशीष जैन से बात की तो हिम्मत आई। हिम्मत और ईश्वरीय कृपा से हम अपने वतन लौटे तो राहत की सांस ली।
- दिव्यांशी जैन, इंदौर
परिवार ने छोड़ी उम्मीद बेटा नहीं आएगा
मैं टर्नोपिल से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा हूं। जैसे ही युद्ध शुरू हुआ, आसपास के माहौल में भय व्याप्त हो गया। बमबारी और धमाकों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। मोबाइल को जैसे-तैसे चार्ज कर परिजनों से बात की। परिवार ने तो उम्मीद छोड़ दी थी कि वापस लौट पाऊंगा या नहीं। भारत सरकार की मदद से स्वदेश लौटने पर चेहरे पर खुशी लौटी है।
- यश वर्मा, धार
खारकीव में आधे घंटे का सफर खतरनाक
मैं खारकीव से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हूं। युद्ध शुरू हुआ तो हर जगह से बमबारी की सूचना आने लगी। जान बचाने के लिए दो दिन बंकर में छिपे रहे। मां नेहा से संपर्क करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। भोजन भी नहीं था। जैसे-तैसे 5 दिन गुजारे। खारकीव के लिए जब निकले तो आधा घंटे का सफर बहुत ही रिस्की था। इस दौरान कुछ भी हो सकता था। अब वतन लौटने पर खुशी मिली।
- अंजलि वेनीपुरी, बुरहानपुर
गोला-बारूद के बीच गुजारे दिन
टर्नोपिल से मैं मेडिकल की पढ़ाई कर रही थीं, तभी युद्ध का ऐलान हो गया। गोला-बारूद और बमबारी के बीच निकलना मुश्किल था। हम जैसे-तैसे निकल पाए। पोलैंड बॉर्डर पर पैदल पहुंचे। 5 दिन का भोजन साथ था तो थोड़ी राहत मिली। सबसे पहले तो हमारी सरकार का धन्यवाद देना चाहूंगी कि जिनके प्रयासों से हम अपने देश-शहर आ सके।
- आयुषी ठाकुर, इंदौर

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