ब्लड डोनेशन में बहुत भारी पड़ रही ये गलतियां, कई लोगों की जान पर बन आई

ब्लड डोनेशन में बहुत भारी पड़ रही ये गलतियां, कई लोगों की जान पर बन आई

अमजद शेख. देवास. वे सभी लोग इस बात का विशेष ध्यान रखे जो परिवार में किसी को खून की जरूरत होने पर इधर-उधर दौड़कर रक्त का जुगाड़ लगाते हैं। दरअसल कोई व्यक्ति अगर विंडो पिरियड्स में हैं तो उसके एचआईवी संक्रमित होने का पता नहीं चलता है।

एचआईवी संक्रमित होने के पहले तीन महीने की अवधि विंडो पिरियड्स कहलाती है। ऐसा व्यक्ति संक्रमित होने के तीन माह के अंदर रक्तदान करता है तो भी उसके एचआईवी पॉजिटिव होने की रिपोर्ट नहीं आएगी।

खतरा यहीं से सभी के लिए हो जाता है। रक्तदान अभी तक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाया है। एचआईवी संक्रमित लोगों में से कई इस कारण चपेट में आ गए कि उन्होंने अकस्मात जरूरत में किसी अनजान सख्श से मिले रक्त का उपयोग किया था।

पत्रिका पड़ताल में ऐसे कई केस सामने आए हैं कि एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाने के बाद अब एआरटी(एटी रिट्रो वायरल थैरेपी) की दवाओं से जिंदगी को बचाने की जंग लड़ रहे हैं। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के प्रोट्रोकॉल के अनुसार एचआईवी संक्रमित की पहचान उजागर नहीं की जा सकती।

एचआईवी संक्रमित व्यक्ति की जानकारी गोपनीय रखी जाती है। हम यहां प्रोटोकाल का पालन करते हुए सिर्फ परिस्थितियां बयां करेंगे, जिसमें असुरक्षित रक्तदान से एचआईवी संक्रमण का खतरा सामने आ सके। जिले में 2005 से 10 मई 2018 तक एचआईवी जांच की 1 लाख 81 हजार 352 टेस्टिंग की गई। जिसमें से 687 पॉजिटिव मिले।

ऐसा होता विंडो पीरियेड
एचआईवी वायरस के मानव शरीर में प्रवेश के बाद अपने ही समान एंटीबॉडी तैयार करने में लगने वाले समय को विंडो पीरियेड कहा जाता है। यह अवधि 24 दिन से 3 माह तक होती है। कुछ परिस्थितियों में अधिक भी हो सकती है। ब्लड देने से पूर्व एचआईवी टेस्ट होता है। सामान्यत: लेबोरेटरी में लगाए जाने वाले एचआईवी टेस्ट में एंटीबॉडी देखी जाती हैं। जो कि एचआईवी संक्रमित के विंडो पीरियेड में होने के कारण टेस्ट में संक्रमण नहीं आ पाता है और उस व्यक्ति का ब्लड इस तरह की एचआईवी निगेटिव रिपोर्ट के आधार पर संग्रह करके ब्लड बैंक में रखा जाता है। जब स्वस्थ व्यक्ति को इस प्रकार का खून चढ़ाते हैं तो वह एचआईवी संक्रमित हो जाता है।

केस-1
शंभुसिंह(परिवर्तित नाम) लंबे समय से बीमार रहे। बीमारी के चलते शरीर में कई बार खून की कमी हो गई। जरूरत के लिए निजी डोनरों की मदद से खून चढ़ाया। ऐसे ही रक्त चढ़ाने के दौरान एचआईवी संक्रमित का खून चढ़ गया। संक्रमित व्यक्ति विंडो पीरियेड में था, जिसके कारण खून चढ़ाने से पहले एचआईवी की जांच में रिपोर्ट निगेटिव आई थी।

केस-2
कौशल्याबाई (परिवर्तित नाम) को लगातार बीमारी के चलते खून की जरूरत आ पड़ी। एक ही ब्लड ग्रुप होने से कौशल्याबाई को उसके बेटे ने ही खून दिया। लेकिन बाद में कौशल्याबाई एचआईवी पॉजिटिव आ गई। बेटा पेशे से ट्रक ड्राइवर था। एचआईवी संक्रमित बेटा विंडो पीरियेड में होने के कारण मां को भी संक्रमित कर गया।

रक्तदान से पूर्व ये होना चाहिए
रक्तदान के पूर्व राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार पांच स्टेप होती है। इन पांच स्टेपों द्वारा रक्तदान को लेकर ये तय किया जाता है कि रक्तदान सुरक्षित है। अगर इन पांच स्टेपों में कही भी गड़बड़ी निकलती है तो फिर संदेह के आधार पर ब्लड जरूरतमंद को नहीं चढ़ाया जाता है।

नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (नाको) के प्रोटोकॉल अनुसार सरकारी ब्लड बैंक(मप्र राज्य एड्स नियंत्रण समिति दरा संचालित) प्रोटोकॉल का पालन करते हैं, ऐसा दावा किया जाता है? निजी ब्लड बैंक वालों को भी इसी प्रोटोकॉल के अनुसार रक्त का संग्रहण कर ब्लड बैंक बनाना चाहिए, लेकिन अधिकांश जगह पर लापरवाही की जाती है।

1. रक्तदान पूर्व जानकारी
2. रक्तदान पूर्व परामर्श
3. रक्तदान प्रश्नावली व स्वास्थ्य परीक्षण
4. रक्तदान के दौरान परामर्श
5. रक्तदान के पश्चात परामर्श

रक्तदाता को भी जागरूक होना जरूरी है। ऐसे मरीज जिनको रक्त की आवश्यकता हो, उन्हें भी जागरूक होना चाहिए। नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) के प्रोटोकॉल का सरकारी व निजी ब्लड बैंक में पालन किया जाता है। रक्तदाता से रक्तदान के पूर्व काउंसलिंग की जाती है।

उनके लिए जरूरी है कि जो सवाल पूछे जाए उसका पूरी-पूरी ईमानदारी से जवाब दे। अगर कुछ माह पूर्व किसी फर्जी डॉक्टर से सुई लगवाई हो, या फिर सड़क किनारे किसी से टेटू बनवाया हो ऐसी सभी जानकारी देना चाहिए। अगर कोई रक्तदाता संदिग्ध लगता है तो फिर उसे डेढ़ से दो माह बाद रक्तदान के लिए आने का कहा जाता है। -डॉ. शरद वीरपरा, जिला नोडल अधिकारी, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यकम

अर्जुन रिछारिया Incharge
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