शहरीकरण में पुराने दरख्त घटे तो कांक्रीट की दीवारों में घरौंदा बनाने लगे इंडियन ग्रे हॉर्नबिल

शहर के बर्ड एक्सपर्ट ने रिसर्च में देखी , पक्षियों में जिंदगी की जद्दोजहद

इंदौर. शहरीकरण का दबाव, बढ़ती जनसंख्या और तेजी से विकास की लालसा हमें इंडियन ग्रे हॉर्नबिल पक्षियों से दूर कर रही है।
घर के चौबारे में आम-नीम के पेड़ तो गुजरे वक्त की बात हो गई है, लेकिन अब ये फलदार व छायादार दरख्त शहर से भी गायब हो रहे हैं। इससे शहर में इन पक्षियों के वजूद पर खतरा मंडराने लगा है। हालांकि बदलते परिवेश में अपना अस्तित्व बचाने के लिए ये पक्षी अब खुद भी बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। शहर के बर्ड एक्सपर्ट अजय गड़ीकर ने इन पक्षियों पर आठ साल की रिसर्च के आधार पर इनके बदलते बर्ताव का पता लगाया है। उन्होंने बताया कि रिसर्च में एक बड़ा बिहेवियर चेंज सामने आया है।
अपने आप को बचाने के लिए हॉर्नबिल पहली बार कांक्रीट की दीवारों पर नेस्ट बना रहे हैं। यहां वे अपने बच्चे और फीमेल को फीड करने लगे हैं। इस तरह से वे कम होते पेड़ों का विकल्प तलाश रहे हैं।

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दो फीट के पक्षी को रहने के लिए चाहिए , तीन से चार फीट मोटे तने वाला पेड़
उन्होंने बताया कि शहर में हॉर्नबिल यशवंत क्लब, रेसीडेंसी, नौलखा क्षेत्र में ज्यादा पाए जाते हैं क्योंकि यहां पुराने घने पेड़ हैं। पीपल, गुलर, बरगद के पेड़ों पर लगने वाला फल ये खाते हैं। इनका नेस्टिंग का जटिल तरीका ही इन्हें अन्य पक्षियों से अलग बनाता है। दो फीट के इन पक्षियों को रहने के लिए ३-४ फीट मोटे तने वाले पेड़ों की आवश्यकता होती है, लेकिन अब पुराने पेड़ों की कमी से इन्हें मुश्किलें आ रही हैं। अजय २०१० से हॉर्नबिल के फॉरेस्ट नर्सरी, जू, नवरतनबाग स्थित नर्सरी सहित १० क्षेत्रों के नेस्ट पर नजर रखे हुए हैं।

आशियाने के लिए अब आपस में झगड़े शुरू
प्राकृतिक असंतुलन में अपने आप को बचाने की कोशिश में रोटी के टुकड़े, ब्रेड खाने लगे हैं।
नेस्ट कम होने से आपस में झगड़े हो रहे हैं। अब तक सिर्फ मैना, पैरेट, उल्लू से ही झगड़ते थे।
इन्हें बचाने के लिए आर्टिफिशियल नेस्टिंग की बहुत जरूरत है। बगीचे, बिल्डिंग्स में नेस्ट बॉक्स रखने होंगे।
आमतौर पर अप्रैल में ब्रीडिंग शुरू होती है, लेकिन पिछले दो साल से मार्च में ही फीमेल केवीटी में जाने लगी है।

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पक्षी संरक्षण का संकल्प लेकर बांटे सकोरे, स्काय ग्रुप का गेट-टुगेदर

इंदौर . जिस तरह वृक्ष नि:स्वार्थ भाव से प्रकृति की सेवा करते हैं, हमें भी उसी भाव से प्रकृति और पक्षियों का संरक्षण करना चाहिए। इस दुनिया में सबसे सुंदर पक्षियों की प्रजातियां हमारे देश में ही पाई जाती है। अगर हम इनका संरक्षण नहीं करेंगे तो प्रकृति के सबसे सुंदर तोहफे से हाथ धो बैठेंगे। गर्मी के मौसम में प्यास से भटककर पक्षियों की मौत हो रही है। ऐसे में हमें इन्हें बचाने के लिए आगे आना होगा। यह कहना है स्काय ग्रुप की सहसचिव शिवानी जैन का। मंगलवार को निजी रेस्त्रां में हुए स्काय ग्रुप की गेट-टुगेदर में मेंबर्स ने पार्टी के साथ ही पक्षी संरक्षण का संकल्प भी लिया। सदस्यों ने अपने घर-आंगन में रखने के लिए १०० से ज्यादा सकोरे भी बांटे। सभी मेंबर्स समर थीम पर पहुंची। क्वीन कॉन्टेस्ट हुआ। इसमें तृप्ति बाबेल प्रथम, वैशाली जैन द्वितीय, रानी जैन तृतीय रहीं। फिर अंताक्षरी, तंबोला, चेयर रेस, नींबू रेस सहित कई गेम्स खेले। जज पुष्पा मेहता, छाया देवड़ा, अंजू नाहर थीं। अध्यक्ष अनीता जैन, मनीषा जैन, रंजना बाघरेचा, सचिव अर्चना जैन, उमा अग्रवाल, रीना जैन, नम्रता दीवाकर, रीना छाजेड़ आदि मेंबर्स मौजूद थीं।

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अर्थ डे मनाया, कॉलेज परिसर में रखे सकोरे
डीएवीवी के आइएमएस में मंगलवार को अर्थ डे मनाया गया। इसमें प्रोफेसर्स व स्टूडेंट्स ने पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। साथ ही फैकल्टीज को मिट्टी के सकोरे बांटे गए। प्रोफेसर के मुताबिक संस्थान की हर खिडक़ी पर पक्षियों के लिए सकोरे रखे जाएंगे। नियमित रूप से पानी और अनाज की व्यवस्था करेंगे

अर्जुन रिछारिया Incharge
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