'ट्रक गुम हो जाता है, रेल गुम नहीं होती, क्योंकि पटरी पर चलती है, समाज भी अपनी पटरी पर चले तो सब बदल जाए'

'ट्रक गुम हो जाता है, रेल गुम नहीं होती, क्योंकि पटरी पर चलती है, समाज भी अपनी पटरी पर चले तो सब बदल जाए'

Hussain Ali | Updated: 22 Jul 2019, 08:30:00 AM (IST) Indore, Indore, Madhya Pradesh, India

चातुर्मास के लिए तीसरी बार इंदौर आए पद्मविभूषण आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर ने देश व समाज तमाम विषयों पर की खुलकर बात।

इंदौर. चातुर्मास के लिए तीसरी बार इंदौर आए पद्मविभूषण आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर ने देश व समाज तमाम विषयों पर की खुलकर बात। उन्होंने कहा कि एक संत जो धर्म और आध्यात्म पर सिर्फ प्रवचन नहीं देते। मूल्यों के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक के सामने खड़े होने का माद्दा रखते हैं। सत्ता के शीर्ष को चुनौती देने से परहेज नहीं करते। सेक्स एजुकेशन का मामला हो या फिर बांग्लादेश के कत्लखानों में हिंदुस्तान से मवेशियों को भेजने का मसला, वे बड़े बदलाव का माध्यम बने हैं। दर्शन भी सीधा है, वे चाहते हैं कि दुर्जन सज्जन हो जाएं, सज्जन संगठित हो जाएं और संगठित सज्जन सक्रिय हो जाएं तो कोई बदलाव मुश्किल नहीं है। रेल गुम नहीं होती, क्योंकि वह पटरी पर चलती है, समाज अपनी पटरी बना ले, उस पर चले तो सबकुछ बदल जाएगा।

- सेक्स एजुकेशन में खराबी क्या है?
इसका जो प्रस्तावित सिलैबस था, वह मैंने शीर्ष नेताओं के सामने रखा था। संसद में सवाल उठाया, सुप्रीम कोर्ट में बात रखी। सबकी आंखें खुल गईं। जिन देशों में ये लागू है, वहां के स्कूलों की बच्चियां खुद जाकर अबॉर्शन कराती हैं। जो शिक्षा प्रकृति खुद देती है, उसके लिए अलग से प्रयास की क्या आवश्यकता है? यह सिर्फ दवा कंपनियों की साजिश से अधिक कुछ नहीं था।

-समाज पर अनुशासन थोपने की जरूरत क्यों है?
क्लास मर्यादा का पालन कर सकता है, लेकिन मॉस के लिए अनुशासन बनाना ही होगा। परिवार में, समाज में, सभी में मर्यादा की जरूरत है। चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल लगाते ही हैं ना। कितने लोग बगैर सिग्नल मन से रोके जा सकते हैं। सभी लोगों को साधने के लिए व्यवस्था देना ही होगा। आजादी और स्वछंदता में जरा सा अंतर है। उसे समझना ही होगा।

- मर्यादा की सारी अपेक्षा स्त्रियों से ही क्यों?
पुरुष से भी है, लेकिन स्त्री से अधिक, क्योंकि वह सृजनकर्ता है। पुरुष जो सृजन करता है, वे सब जड़ होते हैं। स्त्रियां अकेली हैं, जो जीवन का सृजन करती हैं। वे सिगरेट, मद्यपान में लिप्त हुईं तो पीढिय़ां बर्बाद हो जाएंगी। फिर पुरुष कुछ गलती करते हैं तो उससे स्त्रियों को दोहराने का हक तो नहीं मिल जाता है ना। सिगरेट के पैकेट पर बड़े शब्दों में लिखा होता है, पढक़र भी न समझ पाएं तो क्या कहेंगे।

- संतों की भूमिका बहुत बदल नहीं गई है क्या?
संत के पास इच्छाशक्ति है, लेकिन क्रियाशक्ति नहीं। सरकार व समाज के पास क्रियाशक्ति है। संत की इच्छाशक्ति और सरकार की क्रियाशक्ति मिल जाए तो बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। बांगलादेश में भारत से प्रतिदिन 30 हजार मवेशी कत्लखानों में जाते थे। मैंने जिम्मेदारों के सामने तथ्य रखे, उस पर पाबंदियां लगीं और अब आंकड़ा 1500 रह गया है।

- स्कूल व अस्पताल छोड़, हम मंदिरों में पैसा लगाते हैं?
जब मंदिर की बात आती है, तभी लोगों को स्कूल और अस्पताल दिखाई देते हैं। आईपीएल में सट्टा, शराब और अन्य बुराइयों पर करोड़ों खर्च हो जाते हैं तब किसी को यह नहीं दिखाई देता। आईपीएल के मैच रात में होते हैं, उनमें इतनी बिजली जलती है, जितने से कई गांव रोशन हो जाएं। तब कोई शिकायत नहीं करता। मंदिर आस्था के केंद्र हैं, लोगों को सही दिशा देते हैं, उन पर ऐतराज क्यों होना चाहिए।

- संत इतने निराश क्यों लगते हैं?
संत निराश नहीं हैं, सवाल उठा रहे हैं। लोग ‘कबीर सिंह’ पर पैसा खर्च कर रहे हैं। वह करोड़ों इकट्ठा करके कह रहा है कि आप ऐसा मत करना। इनका विरोध क्यों नहीं होता? हर साल ऐसी कई फिल्में बनती हैं, जो समाज को गलत दिशा में ले जा रही हैं, वेब सीरिज बनाई जा रही हैं, उनका कोई विरोध क्यों नहीं करता। मैं पूछता हूं लोगों से, वे जो टीवी, फिल्म में कर रहे हैं, आपके घर पर करने लगेंगे तो क्या आप इजाजत दे सकेंगे।

- इतने अनुष्ठानों के बाद भी स्थिति क्यों नहीं बदल रही?
बड़ी वजह एजुकेशन है, जो कॅरियर पर आधारित है, उसमें कैरेक्टर पर बात ही नहीं है। स्कूली बच्चे दिशा भटक रहे हैं। नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रमों से गायब हो चुकी है। विवेकानंद, गांधी पर बात नहीं की जाती। ‘कबीर सिंह’ लोगों के बीच चर्चा का विषय है। आज सवाल उठा सकते हैं कि सीता की मर्यादा की रक्षा के लिए इतने लोग मरे, लेकिन वह मूल्य की बात है, उसके लिए कुछ भी होम किया जा सकता है।

- फिर इन समस्याओं का हल कहां देखते हैं?
हल सामूहिक प्रयासों से होगा। जो गलत है, उस पर सवाल उठाने होंगे। युवा क्रिकेट के दीवाने हैं, क्रिकेट में एक पिच होती है, एक क्रीज होती है। पिच और क्रीज के बिना कोई मैच नहीं होता। युवा समझें, अपने लिए भी पिच और क्रीज बनाएं। उसका पालन करें। विदेशी कंपनियों की साजिश समझें, क्यों थोड़े वर्षों में चार विश्व सुंदरियां हो गईं, क्योंकि वे सौंदर्य प्रसाधन के उत्पाद खपाना चाहते हैं।

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