12 प्रतिशत की स्टाम्ब ड्यूटी कमजोर आर्थिक वर्ग के लोगों को कर रही परेशान

- वकीलों की संस्था ने सीएम से की कम करने की मांग, आसपास के अन्य प्रदेशों में ही कम लगता है शुल्क

- पैसों के लेन देने से जुड़े विवाद का केस लगाने से पहले जमा करने पड़ती है राशि

इंदौर. पैसों के लेन देन और प्रॉपर्टी से जुड़े मामलों में कोर्ट में केस लगाने के लिए लगने वाले 12 प्रतिशत का न्याय शुल्क आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए परेशानी का सबब बना हुई है। कोरोना काल में बिगड़े आर्थिक हालातों में इसकी वजह से और दिकक्ते आ रही हैं। इस मामले में अब वकीलों की संस्था ने न्याय शुल्क (स्टाम्प ड्यूटी) कम करने की मांग सरकार से की है। संस्था न्यायाश्रय का कहना है मप्र के आसपास के प्रदेश में बेहद कम स्टॉम्प ड्यूटी है। सेंट्रल इंडिया में सबसे अधिक स्टाम्प ड्यूटी मप्र में ही ली जा रही है, इसलिए इसे कम किया जाना चाहिए। संस्था के अध्यक्ष पंकज वाधवानी ने कहा उदाहर के लिए यदि किसी के बीच एक लाख रुपए के लेन देने का विवाद है और उसे इसे लेकर कोर्ट में केस दर्ज करना है तो उसे पहले 12 हजार रुपए राशि की स्टाम्प ड्यूटी चुकाना होगी फिर केस दर्ज हो सकेगा। पहले से आर्थिक धोखाधड़ी का शिकार फरियादी को कोर्ट में केस लगाने के लिए भी राशि जमा करने पर उसपर आर्थिक बोझ बढ़ता है। इसके अलावा वकील की फीस भी चुकना ही पड़ती है। राजस्थान में यह शुल्क करीब 4 प्रतिशत है जबकि महाराष्ट्र में तीन फीसदी के आसपास है। संस्था ने मुख्यमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखकर स्टाम्प ड्यूटी कम करने की मांग की है। उनका कहना है इतना अधिक न्याय शुल्क होने से संविधान की भावना आम जनता को सस्था और सुलभ न्याया दिलाना भी गलत साबित हो रहा है। अपना पैसा वापस हासिल करने से जुड़ी न्यायिक प्रक्रिया में अधिक धन खर्च होने के चलते फरियादी वैकल्पिक तरीकों पर जाता है जो समाज के लिए अनुचित है। संस्था के डीके चांडक, नितिन उदासी, सचिन भावसार, मनोज साहू, चेतन, विवेक व्यास ने मिलकर एडीएम पवन जैन को सीएम के नाम पत्र दिया है।

विकास मिश्रा
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