मृत्यु की ओर बढ़ रहे तीन कैदियों का जीवन दर्शन है नाटक 'आलबेल'

मृत्यु की ओर बढ़ रहे तीन कैदियों का जीवन दर्शन है नाटक 'आलबेल'

Amit S. Mandloi | Publish: Aug, 12 2018 09:57:36 AM (IST) Indore, Madhya Pradesh, India

सानंद की मराठी नाट्य स्पर्धा में अविरत की प्रस्तुति आलबेल

 

इंदौर.सानंद नाट्य प्रतियोगिता में शनिवार शाम थिएटर ग्रुप अविरत के कलाकारों ने यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में अभिनय देशमुख के निर्देशन में सई परांजपे का लिखा नाटक आलबेल प्रस्तुत किया। अभिनय प्रतिभाशाली युवा रंगकर्मी हैं और उनके कल्पनाशील निर्देशन ने नाटक को प्रभावी, दर्शनीय और रोचक बनाया।

नाटक में तीन मुख्य पात्र हैं, जो खून के इल्जाम में जेल में बंद हैं। तीनों जेल में एक साथ रहते हैं, जबकि तीनों की पृष्ठभूमि अलग है और सामान्य जीवन में शायद ये कभी मिल ही नहीं सकते थे। तीनों में से एक भैरव सुपारी किलर है, जिसे फांसी की सजा मिली है। दूसरे एक टीचर बप्पा हैं, जिन पर हत्या का आरोप है पर दरअसल हत्या उन्होंने नहीं, उनकी बेटी ने की थी। उसका इल्जाम उन्होंने अपने सिर ले लिया। तीसरा सदा है, जिस पर पत्नी की हत्या का इल्जाम है। बप्पा बताते हैं कि उनकी बेटी ने दुष्कर्मी से अपना बचाव करते हुए उसकी हत्या कर दी थी। उनका केस फिर से खोला जाता है और अंतत: उनके बरी होने की संभावना हो जाती है। बाद में सदा के केस में उसके बरी होने की उम्मीद जागती है।

नाटक में तीनों का पहले अलग-अलग रहना, फिर सदा और बप्पा के बीच दोस्ती होना और फिर इनके साथ सुपारी किलर की दोस्ती को मार्मिक ढंग से दिखाया है। सुपारी किलर पहले बहुत रिजर्व रहता है पर बाद में वह इन दोनों के साथ घुल- मिल जाता है। तीनों अपनी-अपनी कहानियां एक-दूसरे को सुनाते हैं। ये कहानियां फ्लैशबैक में चलती हैं। यहां निर्देशक ने एक प्रयोग किया है। तीनों के फ्लैशबैक में वीडियो प्रोजेक्शन का उपयोग किया है।

कहानी में मोड़ उस वक्त आता है, जब सदा और बप्पा की रिहाई नजदीक आने लगती है, तब सदा बप्पा से कहता है कि वह उनके स्कूल में उसे टीचर लगवा दें। इस बात पर बप्पा मान जाते हैं, लेकिन सदा फिर कहता है कि वह उनकी उसी बेटी से विवाह करना चाहता है, जिसे बचाने के लिए वे जेल में आए हैं। इस पर पहले तो बप्पा राजी नहीं होते लेकिन बाद में सहमति दे देते हैं पर फैसला अपनी बेटी पर छोड़ते हैं। पूरा नाटक तीनों कैदियों के जीवन दर्शन को दिखाता है कि मौत की सजा की ओर बढ़ते हुए भी तीनों जीवंतता नहीं छोड़ते और न निराश होते हैं। सदा के रूप में निर्देशक अभिनय देशमुख खुद थे और इस दोहरी जिम्मेदारी को उन्होंने कामयाबी से निभाया भी। बप्पा की भूमिका अभिनय के पिता और शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी राजन देशमुख ने निभाई। सुपारी किलर बने थे पराग कुलकर्णी।

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