TEACHER'S DAY : ब्लैकबोर्ड से लैपटॉप तक, टेक्नोलॉजी ने ऐसे बदल दी है टीचिंग

TEACHER'S DAY : ब्लैकबोर्ड से लैपटॉप तक, टेक्नोलॉजी ने ऐसे बदल दी है टीचिंग

Amit S. Mandloi | Publish: Sep, 05 2018 04:35:41 PM (IST) Indore, Madhya Pradesh, India

टीचर्स डे के मौके पर हमने शहर के उन टीचर्स से बात की जो उसी संस्थान मंे शिक्षक हैं जहां से वो पढ़ कर निकले हैं।

इंदौर. पिछले तीन- चार दशकों में सूचना क्रांति के कारण हर जगह टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ा है और नई तकनीकों ने पुराने तौर -तरीके बदल कर रख दिए हैं इसलिए टीचिंग की दुनिया भी बदल गई है। टीचर्स डे के मौके पर हमने शहर के उन टीचर्स से बात की जो उसी संस्थान मंे शिक्षक हैं जहां से वो पढ़ कर निकले हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह टीचिंग में चेंज हुआ और उस चेंज ने स्टूडेंट- टीचर के रिश्ते भी बदले हैं।

हर वक्त अपडेट रहते हैं

1971 में मैने एमजीएम मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया था और 1982 से पढ़ा रहा हूं। हम जब पढ़ते थे तब टीचर चॉक- ब्लैक बोर्ड से पढ़ाते थे, हाथ से डायग्राम बनाते। ओवर हेड प्रोजेक्टर आया था जिसमें ट्रांसपेरेंसी दिखाई जाती थीं और उसके बाद स्लाइड प्रोजेक्टर आया और अब पॉवरपॉइंट प्रेजेन्टेशन देते हैं। अब जो स्टूडेंट्स हैं वो नेट की वजह से ज्यादा अपडेटेड हैं इसलिए हमें भी अपडेटे रहना होता है। वैसे एक बात नहीं बदली है वो है प्रेक्टिकल नॉलेज देने का तरीका जो केवल वॉर्ड में ही मिल सकता है क्योंकि नेट पर सिर्फ थ्योरी मिलती है।

- डॉ. शरद थोरा, डीन, एमजीएम

आज के स्टूडेंट्स ज्यादा प्रैक्टिकल

1975 में एमबीबीएस किया। आज के स्टूडेंट जितने मैच्यौर और कॅरियर को लेकर प्रैक्टिकल हैं उतने हम नहीं थे। अब कम है क्योंकि स्टूडेंट्स को एक्सपोजर ज्यादा मिलता है। परीक्षा का तनाव भी नहीं होता था इसलिए हम वॉर्ड में ज्यादा समय तक रहते थे और अपने टीचर्स से प्रैक्टिकल नॉलेज लेते थे पर अब एमबीबीएस वालों को पीजी में एडमिशन का तनाव है तो पीजी वालों को सुपर स्पेशियलिटी का। थ्योरी पर ज्यादा और प्रैक्टिकल पर कम ध्यान दे रहे हैं। परीक्षा में भी रटे जाने वाले प्रश्न ज्यादा पूछे जाते हैं।

- डॉ. अपूर्व पौराणिक, प्रोफेसर

डीन की गाड़ी देखते ही दुबक जाते थे

1975 में कॉलेज में डीन की गाड़ी देखते ही कैंपस में स्टूडेंट्स दुबक जाते थे। अब एेसा माहौल नहंी है। क्योंकि अब बच्चे घर में पेरेंट्स से कहां डरते हैं। अटेंडेंस पूरी रहती थी क्योंकि एक फीसदी भी मैनेज नहीं हो पाती। अब हम लोग पीपीटी देते हैं हालांकि हाल हीे में एक स्टडी में ये तथ्य सामने आया है कि ब्लैक बोर्ड सिस्टम ही पढ़ाई का सबसे अच्छा तरीका है। वैसे अभी भी मेडिकल कॉलेज में लाइब्रेरी का महत्व कम नहंी हुआ है आज भी रात ११ बजे तक लाइब्रेरी खुली रहती है। हम लोग नोट्स ज्यादा बनाते थे पर अब स्टूूडेंट्स नोट्स कम बनाते हैं।

डॉ. मनोहर भंडारी, प्रोफेसर

स्कूल जैसी टीचिंग होती थी

1978 में एसजीएसआईटीएस में आया तब कॉलेज में स्कूल जैसी ही टीचिंग होती। थी इंजीनियरिंग की किताबें ज्यादा अवेलेबल नहीं थे, नोट्स पर जोर होता और रिफरेंस के लिए लाइब्रेरी में जाते। अब नेट पर ंआइआइटी के प्रोफसर्स के नोट्स अवेलेबल हैं। हम टीचिंग में स्टूडेंट्स को भी शामिल करते हैं यानी कोर्स में से कुछ चीजें उन पर छोड़ते हैं ताकि वो खुद पढ़ कर सीखे। ७० के दशक में हमारी क्लास में 50 स्टूडेंट्स होते थे जो अब १४५ तक हो गए हैं इसलिए हमारे टीचर्स हर स्टूडेंट पर पर्सनल ध्यान देते थे जो अब संभव नहीं है।

संदीप नारूलकर, प्रोफेसर

टीचिंग ऑडियो विजुअल हो गई

40 साल पहले कॉलेज में आया तब टीचर ब्लैकबोर्ड पर ही पढ़ाते थे। अब हम ऑडियो- विजुअल टीचिंग कर रहे हैं। हमारे समय कम्प्यूटर नहीं थे। अब स्टूडेंट्स स्कूल में ही कम्प्यूटर का जानकार हो जाता है। अब साइंस- इंजीनियिरिंग का कोई भी जर्नल मोबाइल पर है, इसलिए टीचर को अपने आप को अपडेट रखना होता है। कम्प्यूटर के ज्यादा इस्तेमाल से हाथ से काम करने की आदत कम हो गई है। पर मैं मानता हूंं कि इस दौर के स्टूडैंट काफी अच्छा काम कर रहे हैं और ज्यादा स्मार्ट हैं। टीचर का आदर सम्मान आज भी वैसा ही है।

मिलिंद दांडेकर, प्रोफेसर

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