scriptThe farmer did not get the money, got the land transferred | किसान को नहीं मिले रुपए, कर दिया जमीन का नामांतरण | Patrika News

किसान को नहीं मिले रुपए, कर दिया जमीन का नामांतरण

नायब तहसीलदार का कारनामा, भाजपा नेता ने बनाया था दबाव, पीडि़त किसानों ने लगाई एसडीओ से गुहार

इंदौर

Published: May 04, 2022 11:58:22 am

इंदौर। रसूखदारों की एक कंपनी ने 12 साल पहले कुछ किसानों से जमीन का सौदा किया। रजिस्ट्री करवा ली लेकिन जो चेक दिए थे, वो बाउंस हो गए। किसान बार-बार रुपयों के लिए चक्कर लगाते रहे लेकिन कंपनी के कलाकार
उन्हें टरकाते रहे। कुछ समय पहले नामांतरण का आवेदन लगाया। तहसीलदार ने राजनीतिक दबाव के साथ सांठगांठ करते हुए जमीन का नामांतरण कर दिया, जबकि किसान आज भी खाली हाथ हैं। हालांकि पीडि़तों ने अब एसडीओ की अदालत में अपील की है। बताया जा रहा है कि जमीन खरीदने वाली कंपनी से जमीन के जादूगर केके गोयल का भी कनेक्शन है।
किसान को नहीं मिले रुपए, कर दिया जमीन का नामांतरण
किसान को नहीं मिले रुपए, कर दिया जमीन का नामांतरण
भाजपा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के खास केके गोयल का न्यू पलासिया वाला मामला सुलझा नहीं था कि एक और सामने आ गया। ये मामला महू तहसील के पानदा गांव का है। अमरसिंह पिता नंदराम ने 12 साल पहले सर्वे नंबर 10 व 11/1 की 1.074 हेक्टेयर जमीन का सौदा डिवाइन बिल्डवेल प्राइवेट लिमिटेड तर्फे डायरेक्टर आनंद गोयल से 2 करोड़ 8 लाख रुपए में किया था। रजिस्ट्री में चार चेक दिए, वे बाउंस हो गए। इस पर जब किसान ने आग्रह किया तो उन्हें आश्वासन दिया गया कि जल्द ही राशि सौंप दी जाएगी, तब से ही वे टालमटोली कर रहे हैं।
पैसा दिया नहीं और कंपनी ने तहसीलदार की अदालत में कुछ समय पहले जमीन नामांतरण का आवेदन दे दिया। इस पर तहसीलदार की तरफ से नामांतरण के पहले पेश होने को कहा गया। बाद में पानदा गांव महू तहसील से शिफ्ट होकर राऊ में आ गया और मामले की सुनवाई नायब तहसीलदार संजय गर्ग की अदालत में होने लगी। किसान के वकील ने पक्षकार को पूरे पैसे नहीं मिलने पर नामांतरण किए जाने पर आपड्डिा ली। साथ में शरद काले द्वारा नामांतरण आवेदन पेश किए जाने का विरोध किया। तर्क था कि विधिक प्रावधानों के अनुसार किस हैसियत से काले ने आवेदन पेश किया।
ये भी कहा गया कि धारा1 09 में नामांतरण प्रकरण पर रजिस्ट्री के छह माह तक सुनवाई की जा सकती है, इस प्रकरण में 12 वर्षों से अधिक हो गए। नायब तहसीलदार गर्ग ने राजनीतिक दबाव में बगैर आपड्डिा सुने जमीन का नामांतरण कंपनी के नाम पर कर दिया। ये भी नहीं देखा कि जिस रजिस्ट्री के आधार पर वे नामांतरण कर रहे हैं, उसमें दिए गए चेक का भुगतान भी किसान को नहीं हुआ।
किसान को परेशान होते हुए एक दशक से ज्यादा हो गए, जबकि जमीन का कब्जा आज भी किसान के पास ही है। उन्होंने एसडीओ प्रतुल्ल सिन्हा के यहां अपील की। हालांकि कंपनी अब किसान को समझौता कर मामला रफा-दफा करने का प्रयास कर रही है, जिसको लेकर बैठकें भी हो रही हैं। बताया जा रहा है कंपनी में पर्दे के पीछे केके गोयल का हस्तक्षेप है। अब हालत ये है कि कंपनी वाले समझौता कर पुरानी कीमत देने का प्रयास कर रहे हैं, जो बहुत
कम है। कानूनी तौर पर वे चाहें तो रजिस्ट्री को शून्य करवा सकते हैं लेकिन उन पर भारी राजनीतिक दबाव भी बनाया जा रहा है।
केस-2
पीडि़त सिर्फ अमरसिंह ही नहीं हैं, उनके रिश्तेदार श्रवणसिंह पिता सरकारसिंह भी हैं। उनसे भी कंपनी ने सर्वे न्बर 11/3/1 की 0.596 हेक्टेयर जमीन का सौदा डिवाइन बिल्डवेल प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर किया था। उन्हें भी चार चेक दिए गए, जो बाउंस हो गए। नायब तहसीलदार गर्ग ने दबाव में 11 मार्च 2022 को नामांतरण का आदेश जारी कर दिया।
केस-3
डिवाइन बिल्डवेल प्राइवेट लिमिटेड ने एक सौदा समंदरसिंह पिता सरकारसिंह की पानदा सर्वे नंबर 11/3/2 पैकि रकबा 0.411 हेक्टेयर का भी किया था। उन्हें भी चेक दिए थे लेकिन राशि किसान के खाते में नहीं पहुंची। पूरा पैसा दिए बगैर नामांतरण का तहसीलदार की अदालत में आवेदन लगाया गया और नायब तहसीलदार गर्ग ने बिना जांच करे सांठगांठ और राजनीतिक दबाव में आदेश जारी कर दिया।
केस-4
कैलाश पिता नंदराम ठाकुर की पानदा में सर्वे न्बर 11/2 पैकि रकबा 0.940 हेक्टेयर जमीन थी, जिसका सौदा डिवाइन बिल्डवेल प्राइवेट लिमिटेड ने किया था। उसमें भी पैसा बकाया है, उसके बावजूद नायब तहसीलदार गर्ग ने बिना जांच करे राजनीतिक दबाव के नामांतरण करने का आदेश जारी कर दिया। प्रकरण चलने के दौरान किसान ने कई बार कहा कि हमें पैसा नहीं मिला है लेकिन एक नहीं सुनी गई।
शिकायत की तैयारी
पीडि़त किसानों ने तहसीलदार के आदेश पर एसडीओ सिन्हा के यहां अपील तो कर दी लेकिन धोखाधड़ी की वे शिकायत की तैयारी कर रहे हैं। वे कलेक्टर मनीष सिंह से लेकर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान तक से वे गुहार लगाएंगे। इस बात की भनक लगने के बाद जमीन के जालसाजों ने किसानों से संपर्क कर
समझौते के प्रयास तेज कर दिए।
खत्म होना चाहिए रजिस्ट्री
गौरतलब है कि किसानों से रजिस्ट्री कराने के बाद कंपनी ने 12 साल निकाल दिए। जमीन औने-पौने दाम पर खरीदी और किसानों को पूरा पैसा नहीं दिया। किसान जमीन बेचकर दूसरी जमीन खरीदना चाहते थे ताकि खेती कर सकें
लेकिन कंपनी की कलाकारी से वे उलझ गए।

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