संतूर पर मिठास का झरना और गायकी में खिले लोक संस्कृति के रंग

Rajesh Mishra | Publish: Mar, 17 2019 06:35:44 PM (IST) | Updated: Mar, 17 2019 06:35:45 PM (IST) Indore, Indore, Madhya Pradesh, India

सांघी संगीत समारोह में तरुण भट्टाचार्य का संतूर वादन और मालिनी अवस्थी का गायन

इंदौर. सोहनलाल सांघी स्मृति संगीत समारोह के दूसरे और आखिरी दिन शहर के संगीतप्रेमियों को बेहतरीन संगीत की सौगात मिली। पहली सभा में पं. रविशंकर के शिष्य तरुण भट्टाचार्य का संतूर वादन हुआ और दूसरी सभा में मालिनी अवस्थी ने शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन पेश किया। संगीत सभा की शुरआत तरुण भट्टाचार्य ने संतूर पर राग जनसम्मोहिनी से की। कश्मीर का यह साज वैसे भी बहुत मीठा साज है और जब यह तरुण भट्टाचार्य जैसे सिद्धहस्त कलाकार के हाथ में हो तो आनंद असीम हो जाता है। उन्होंने तीन ताल और झपताल में कुछ रचनाएं बजाईं। वे राग का विस्तार करते जा रहे थे और संतूर के स्वरों में कभी पहाड़ी झरनों की चंचलता थी तो कभी नदी का तीव्र वेग और कभी मंथर गति से कलकल बहती नदी। प्रकृति से संवाद करते संतूर पर तंत्रकारी का नियंत्रण अद्भुत था। अपने वादन का समापन उन्होंने एक भटियाली धुन से किया। यह धुन इतनी मीठी थी कि समय की मर्यादा न होती श्रोता इसे देर तक सुनना चाहते। इस धुन में नदी में नाव खेते माझी की पुकार महसूस हुई। उनके साथ तबले पर संगत की ज्योर्तिमय रायचौधरी ने।
इतनी अरज मोरी मान लो हो पिया...
मालिनी अवस्थी ने शुरुआत राग भूपाली में छोटे खयाल से की। भूपाली में उन्होंने बंदिश गाई हे महादेव महेश्वर विषधर त्रिपुरारी...। इस बंदिश से उन्होंने यह जता दिया कि उनकी ख्याति भले ही लोक गायन में हो, लेकिन वे एक कुशल शास्त्रीय गायिका हैं। इस बंदिश के बाद बारी आई उपशास्त्रीय गायन की। ठुमरी की महारानी की तरह मशहूर गायिका गिरिजा देवी की शिष्या से सभी को ठुमरी सुनने की उम्मीद थी, जो पूरी हुई जब उन्होंने पहली ठुमरी गाई इतनी अरज मोरी सुन लो हो पिया..., बांह पकर बिनती करत हूं ना जावो पिया परदेस...।
ठुमरी गाते हुए गिरिजा देवी की तालीम और पूरब अंग की बनारसी ठुमरी का बोल बनाव मालिनी अवस्थी के गायन में मौजूद था। इस ठुमरी को गाते हुए प्रियतम की मनुहार करती नायिका के भाव उनकी आवाज, अदायगी और देहभाषा में मुखर हो उठे।
आवो होरी खेलो मो से नंदलाल...
होली के मौसम में होरी तो होना ही थी, इसलिए मालिनी ने राग मिश्रा खंबावती में होरी गाई, आवो होरी खेलो मोसे नंदलाल...। एक और होरी उन्होंने बड़े ठाठ से गाई रंग डारूंगी मैं तो नंदलालन पे...। फागुन में होरी के बाद चैत्र में चैती गाने का मौसम आता है, तो यहां उन्होंने चैती भी पेश की। यह चैती गिरिजा देवी की हस्ताक्षर रचना मानी जाती है। बोल हैं, चढ़त चैत चित लागे ना बाबा के भवनवा... इस चैती में जहां नायिका मायके में प्रियतम को याद कर रही है, वहीं वह मायके भी जाना चाहती है, नैहर से कहू न आइल हो बीतल फगुनवा... लोक संस्कृति से रंग में रंगी हुई इन रचनाओं ने श्रोताओं पर आनंद रस की वृष्टि कर दी। इस रस में भीगे सुनकारों को उन्होंने दादरा भी सुनाया, अब ही तो गइल सइयां पहडि़या की ओट...। अंत में भैरवी में गाया मत मारो तलवरिया नैनन की...।
ठुमरी-दादरा गायन में तबला संगत उसका प्राण होती है। यहां मालिनी के साथ बनारस के रामकुमार मिश्र और हारमोनियम पर धर्मनाथ मिश्र ने बेहतरीन संगत कर गायन को प्रभावी और समृद्ध किया। सारंगी पर थे इंदौर के आबिद खां। कलाकारों का स्वागत शरद सांघी और आरती सांघी ने किया। संचालन संजय पटेल का था।

Malini AwasthiMalini Awasthi

MP/CG लाइव टीवी

खबरें और लेख पड़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते है । हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते है ।
OK
Ad Block is Banned