कलह व रिश्तों की उलझनों में जकड़े ‘आधे अधूरे’ लोग

रंगमंच आर्ट ऑफ ड्रामा ने मोहन राकेश के नाटक का किया मंचन

By: amit mandloi

Published: 24 Jul 2018, 04:27 PM IST

इंदौर. मोहन राकेश का चर्चित नाटक आधे-अधूरे एक लंबे अरसे बाद इंदौर में खेला गया। सोमवार शाम आनंद मोहन माथुर सभागृह में रंगमंच आर्ट ऑफ ड्रामा के कलाकारों ने संदीप दुबे के निर्देशन में आधे-अधूरे का मंचन किया। करीब ५० बरस पहले लिखा गया ये नाटक मध्यमवर्गीय परिवार की कथा है जो आर्थिक तंगी, कलह और रिश्तों की उलझनों में जकड़ा हुआ है। हर पात्र अपने आप में अधूरा है, लेकिन उसे एक पूर्ण साथी की अंतहीन तलाश है।

नाटक की मुख्य पात्र सावित्री महेंद्रनाथ से प्रेम विवाह करती है, लेकिन महेंद्र का व्यापार सही नहीं चल पाता और वह कुछ नहीं कर पाता। घर सावित्री की नौकरी से चलता है। सावित्री को पति को बेकार, निकम्मा मानकर उसे कोई महत्व नहीं देती। दोनों एक-दूसरे से नफरत करते हैं पर उनके लिए साथ रहना सामाजिक मजबूरी भी है। सावित्री को पति व्यक्तित्वहीन और दब्बू नजर आता है और वह किसी एेसे पूर्ण आदमी की तलाश में उससे दूर होती जाती है, जो उसकी कसौटियों पर खरा उतरे। उसके जीवन में चार और पुरुष आते हैं पर सभी आधे-अधूरे हैं।

इस परिवार में तीन बच्चे भी हैं। पति-पत्नी के दरकते हुए संबंधों का असर तीनों बच्चों पर भी पड़ता है और तीनों चिड़चिड़े और विद्रोही स्वभाव के हो जाते हैं। बड़ी लडक़ी अपनी मां के प्रेमी के संग भागकर शादी कर लेती है। उसका पति आर्थिक रूप से सक्षम है, लेकिन फिर भी वह उसके साथ खुश नहीं रह पाती। छोटी बेटी स्कूल में है पर उसे पढ़ाई से ज्यादा रुचि लडक़ों में है और इन दोनों के बीच एक युवा बेटा है जो नौकरी नहीं करना चाहता और इस बात पर सवित्री से अक्सर उसका झगड़ा होता रहता है।

निर्देशक संदीप दुबे ने ही महेंद्रनाथ और अन्य चार पुरुषों की भूमिकाएं भी निभाई हैं। इसमें वे काफी हद तक सफल रहे। सावित्री के रूप में थीं भवानी कौल ने एक मुश्किल किरदार को अच्छी तरह पेश किया। बेटियों के रूप में प्रतीक्षा नैयर और प्रीति मोहन बेटे की भूमिका में रजत शर्मा भी सहज रहे। निर्देशक नाटक की लंबाई कुछ कम रखते तो बेहतर होता। कुछ लंबे दृश्य दर्शकों को उबा रहे थे।

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