आखिर शिक्षाविद डॉ. सद्गोपाल ने क्यों कहा-अच्छा है, हमारे आइआइटी, आइआइएम दुनिया के टॉप हंड्रेड में नहीं हैं

ख्यात शिक्षाविद डॉ. अनिल सद्गोपाल का शिक्षानीति पर व्याख्यान, बोले- इस वहम से बाहर निकलना होगा कि सरकार बेहतरीन स्कूल नहीं चला सकती

इंदौर. प्रख्यात शिक्षाविद और एग्रीकल्चर एक्सपर्ट डॉ. अनिल सद्गोपाल ने शनिवार शाम प्रीतमलाल दुआ आर्ट गैलरी में रूपांकन की ओर शिक्षा नीति पर लगाई गई पोस्टर प्रदर्शनी के दौरान व्याख्यान दिया। उनका कहना है कि हमें इस वहम से बाहर निकलना होगा कि सरकार बेहतरीन स्कूल नहीं चला सकती। सरकार बहुत अच्छे स्कूल चलाना जानती है। इसकी मिसाल है देश में फैले केन्द्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय। इन दोनों स्कूलों के बच्चे महंगे निजी स्कूलों के बच्चों से कॉम्पीटिशन में आगे रहते हैं। बस सरकार को यह तय करना है कि वह किस वर्ग के लिए स्कूल चलाना चाहती है। आइआइएम और आइआइटी भी सरकारी संस्थान हैं।

डॉ. सद्गोपाल ने कहा, अक्सर इस बात का रोना रोया जाता है कि हमारे देश के आइआइटी, आइआइएम दुनिया के टॉप हंड्रेड संस्थानों में शामिल नहीं हैं। कभी इस बात पर भी सोचिए कि यह रैंकिंग कौन तय करता है। इसे इंटरनेशनल मार्केटिंग एजेंसी तय करती है। उन्होंने कहा, इस एजेंसी के मापदंडों में यह शामिल है कि स्टूडेंट्स को मल्टीनेशनल कंपनीज में कितना प्लेसमेंट मिला। इस के मापदंड में यह नहीं देखा जाता है कि इन संस्थानों के विद्यार्थी देश के ग्रामीण अंचलों की समस्याएं हल करने के लिए कौन सी तकनीक खोज रहे हैं।

हमारी शुरुआत विरोधाभास से

जब 25 जनवरी 1949 को संविधान सभा ने संविधान का प्रारूप स्वीकृत किया तो उस वक्त डॉ. आंबेडकर ने एक भाषण दिया था, जिसे दुनिया के श्रेष्ठ पांच भाषणों में शुमार किया जा सकता है। उन्होंने कहा था कि कल से हम विरोधाभास से भरे राजनीतिक जीवन से शुरुआत करने जा रहे हैं क्योंकि संविधान सभी को राजनीतिक रूप से समान अधिकार देता है पर सामाजिक-आर्थिक रूप से देश में भयानक विषमताएं हैं। गैरबराबरी से पीडि़त लोग एक दिन लोकतंत्र को खत्म कर देंगे। उस वक्त आंबेडकर के पास कोई आकंड़े नहीं थे, लेकिन 2017 के आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल संपदा का 70 फीसदी हिस्सा केवल एक फीसदी लोगों के पास है।

आरटीइ से कोई फायदा नहीं
शिक्षा का अधिकार कानून 2009 यानी आरटीइ शिक्षा के बाजारीकरणपर कोई बात नहीं करता, बल्कि उसी सेटअप में दलित-गरीब वर्ग के 25 फीसदी बच्चों को महंगे स्कूल में प्रवेश देता है। अगर आरटीइ के तहत आने वाले पांच वर्गों की बात करें तो हर वर्ग के केवल पांच फीसदी बच्चों को ही इसका फायदा मिलता है, तो बाकी 95 फीसदी बच्चों का क्या। इस नीति के बजाय सरकारी स्कूलों को ही अपग्रेड किया जाता तो बेहतर होता। यह सिद्धांत ही गलत है कि अमीर व्यक्ति का बच्चा महंगे स्कूल में पढ़े और गरीब का बच्चा साधनविहीन स्कूल में।

Nitin chawada
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