DPS (डीपीएस) स्कूल मैनेजमेंट पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं- पैरेंट्स का सवाल

amit mandloi

Publish: Jan, 14 2018 07:22:25 PM (IST)

Indore, Madhya Pradesh, India
DPS (डीपीएस) स्कूल मैनेजमेंट पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं- पैरेंट्स का सवाल

डीपीएस मैनेजमेंट का बर्ताव अच्छा नहीं है बच्चों के साथ, दादी क्या परिवार के कई सदस्य घंटों इसी तस्वीर को देखते रहते हैं।

इंदौर. कभी जो घर बच्चों की खनकती आवाज से गुलजार रहते थे वहां दर्द, गुस्सा, सवाल और गहरी उदासी ने घर बना लिया है। सभी परिजन का केवल एक ही सवाल है- स्कूल प्रशासन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं? आश्वासन कब न्याय में बदलेगा? दोषियों को कब सजा मिलेगी? ५ जनवरी को हुए इस हादसे के बाद जब शुक्रवार को हम इनके घर पहुंचे तो दर्द, गुस्से और शिकायतों के साथ बस यही उम्मीद सामने आई कि जो हमारे साथ हुआ वो किसी और के साथ न हो। सभी बच्चों के घर स्कूल प्रशासन की तरफ से टीचर्स आई थीं, जिन्होंने बच्चों के नाम पर स्कॉलरशिप निकालने की बात कही। पैरेंट्स का कहना है कि जब बच्चे ही नहीं रहे तो इसका क्या करें, हमें समझ ही नहीं आता।


७५ वर्षीय दादी की निगाहें आठ महीने की अपनी श्रुति की तस्वीर को निहारती रहती है। दादी क्या परिवार के कई सदस्य घंटों इसी तस्वीर को देखते रहते हैं। पहली बार श्रुति कान्हा बनी थी। यही तस्वीर घरवालों ने कमरे में लगा रखी है। श्रुति के जाने का दर्द ये घर बोलता है। ऐसा लगता है मानो पूरे परिवार की आवाज चली गई हो। गहरी दर्दभरी खामोशी। दर्दनाक हादसे के सात दिन बाद भी परिवार का यही हाल था। एक बुआ ही थी, जो बात करने की स्थिति में थी। श्रुति की बुआ अंजु बुलानी बताती हैं, हमने अपनी बच्ची खो दी, जो २० साल बाद हजारों मन्नतों के बाद मिली थी। श्रुति की मां के कमरे से हमने सारी तस्वीरें हटा दी हैं। वो बहुत कम बोलती हैं। बोलती हैं तो आंखों से आंसू और होंठों पर सिर्फ उसी की बात होती है। वो कई बार कमजोरी के कारण बेहोश हो जाती हैं। किसी से नहीं मिलती हैं। पापा ने खुद को संभाला हुआ है, ताकि अन्य सदस्य कमजोर न पड़ें।


सही नहीं था बर्ताव
बुआ बताती हैं, हम प्रशासन की जांच के बारे में ज्यादा नहीं जानते। टीचर्स आते हैं, कंसोल करते हैं। स्कूल के प्रिंसिपल ऐसे समय आए, जब हम खुद श्रद्धांजलि के कार्यक्रम के लिए जाने वाले थे। कोई था ही नहीं, घर पर मुश्किल से सात मिनट रुके होंगे। साथ में कोई मैडम आई थी, नाम नहीं याद है, लेकिन उनका बिहेवियर रूड था। वो यहां आए थे, किसी ने फोटो क्लिक की तो बहुत रूडली जवाब दिया। संस्था की तरफ से भी एक कंसोल लेटर आया था। हम बस यही चाहते हैं कि जो हमारी बेबी साथ हुआ वो नहीं होना चाहिए। मैनेजमेंट को स्ट्रांग करने की जरूरत है और हम निष्पक्ष जांच क ी मांग करते हैं।

बच्चे को रख सकंू अमर
स्वस्तिक पंड्या की मां की आंखों में आंसू नहीं बचे और न ही किसी तरह की उम्मीद। वे घंटों अपने बेटे के साथ ली गई लास्ट सेल्फी को देखती रहती हैं। कहती हैं, मेरा बच्चा वापस नहीं आ सकता, लेकिन उसे जिंदा रखना चाहती हूं। मेरा ज्यादातर समय उसकी पढ़ाई में लगता था। अब वो समय खाली है। किसी तरह का गाइडेंस मिला तो जरूर गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहूंगी। लगता है कि सब भूल जाएंगे। मैं अभी खामोश हूं, लेकिन जब सब चुप हो जाएंगे तो मैं सवाल करूंगी। सब मिलने आते हैं, सांत्वना देते हैं। हम मिडिल क्लास लोग हैं। क्या करें समझ नहीं आता। इसीलिए चुप हंै।


आश्वासन से बच्ची नहीं आएगी
मन्नतों से मिलती हैं बेटियां। हमने कई मन्नतें मांगी थीं। रौनक थी, खिलखिलाहट थी। हमने मखमल पर रखकर पाला था उसे। कोई खरोंच तक नहीं आने दी थी। उस दिन गई तो फिर लौटकर नहीं आई। यही शब्द थे हरप्रीत की मां के। वे कहती हैं, हमारे यहां सभी जनप्रतिनिधि आते हैं। कुछ ड्राइवर की गलती बताते हैं तो कुछ कहते हैं जल्द कार्रवाई होगी। सीएम आश्वासन देकर गए थे। कुछ हुआ ही नहीं। क्या किसी को कोई सजा मिली? छोटे लेवल पर कार्रवाई क्यों कर रहे हैं? स्कूल मैनेजमेंट को डायरेक्ट कठघरे में क्यों नहीं लेते? उनके सवाल कई थे। उन्हें जवाब में कोई आश्वासन नहीं, कार्रवा चाहिए थी। परिवार के हर शख्स की आवाज में गुस्सा था। दर्द जिसने गुस्से का रूप ले लिया था। प्रशासन पर कार्रवाई हो, सख्त कार्रवाई हो बस यही हमारी मांग है।

नहीं मिली बेटी की आखिरी यादें
कृति अग्रवाल की मां की आंखों में अब आंसू भी नहीं बचे हैं। लगता है जैसे उस घर की आवाज चली गई है। कृति की मां शनिवार को डीपीएस गई थीं, ताकि उसका बैग, पानी की बॉटल और जूते जो भी बचा हो उसे आखिरी निशानी बनाकर अपने पास रखें। वे बताती हैं, स्कूल क ॉरिडोर में चलते वक्त ऐसा लग रहा था मानो पैरों में बेडिय़ां हों। अपनी बच्ची के बिना एक क दम भी चलना भारी हो रहा था। वो स्कूल भी एक चीख निकाल रहा था। मेरा दिमाग जम गया है। हादसे के चौथे दिन स्कूल प्रिंसिपल आए थे। मेरे कई सवाल थे? उनका एक ही जवाब था- मैं नि:शब्द हूं। उन्होंने मुझे ये आश्वासन भी नहीं दिया कि आगे से ऐसा कोई हादसा नहीं होगा। हम जानते हैं कुछ समय बाद सब भूल जाएंगे। हमें नहीं पता कार्रवाई क्या हो रही है, पर इतना जरूर है कि दोषियों को सजा मिले। एक नया सिस्टम डेवलप करें।

बच्चे को रख सकंू अमर
स्वस्तिक पंड्या की मां की आंखों में आंसू नहीं बचे और न ही किसी तरह की उम्मीद। वे घंटों अपने बेटे के साथ ली गई लास्ट सेल्फी को देखती रहती हैं। कहती हैं, मेरा बच्चा वापस नहीं आ सकता, लेकिन उसे जिंदा रखना चाहती हूं। मेरा ज्यादातर समय उसकी पढ़ाई में लगता था। अब वो समय खाली है। किसी तरह का गाइडेंस मिला तो जरूर गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहूंगी। लगता है कि सब भूल जाएंगे। मैं अभी खामोश हूं, लेकिन जब सब चुप हो जाएंगे तो मैं सवाल करूंगी। सब मिलने आते हैं, सांत्वना देते हैं। हम मिडिल क्लास लोग हैं। क्या करें समझ नहीं आता। इसीलिए चुप हंै।

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