यहां के युवा न्याय के लिए संभालते है मैदान, करते हैं आंदोलन

यहां भी है दूसरा जंतर-मंतर, आंदोलन का शहर, जिम्मेदारों के जागने का इंतजार नहीं करते, पकड़ लेेते है मैदान

By: amit mandloi

Published: 26 Jan 2018, 07:11 AM IST

न्याय मिलने तक होता है आंदोलन, अण्णा के आंदोलन में जुटे थे लाखों लोग

इंदौर. आजादी मिले सालों हो गए लेकिन लोगों को अपने अधिकारों की आजादी नहीं मिल पाई है। आज भी जन को अधिकार व न्याय के लिए मैदान संभालना पड़ता है तब कहीं जाकर न्याय की राह मिलती है। अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, जिम्मेदार उसे गंभीरता से नहीं लेते। लोगों में अब इतना जागरुकता है कि वे जिम्मेदारों के जागने तक इंतजार नहीं करते है, मैदान पकड़ते है, आंदोलन की स्थिति लाकर सभी को जगाते है और न्याय पाते है।

प्रशासन से न्याय पाना आज भी बहुत मुश्किल हो। भले ही कितना भी गंभीर मसला क्यों न हो, पहले पुलिस प्रशासन उसे टालता ही है। जब जनता सडक़ पर आती है, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ती है तब कहीं जाकर जिम्मेदार जागते है और फिर न्याय की राह बनती है।

मैदान पकड़ा तब मिली 200 लोगों को न्याय की आस
नवंबर 2017 का मामला ऐसा है जिसमें 200 लोगों ने जब मैदान पकड़ा तब उन्हें न्याय की आस मिली। एरोड्रम, मल्हारगंज इलाके में रहने वाले 200 लोगों के साथ नरेंद्र, सपना व उनके परिवार के लोगों ने ठगी की थी। मजदूरों कर रोजी रोटी कमाने वाले को फायदे का लालच देकर महीनों राशि जमा कराने के बाद करोड़ों रुपए इकट्ठा कर दंपती फरार हो गए थे। लोगों ने पुलिस की मदद ली लेकिन जांच का नाम पर छलावा दिया। मेहनतकश लोगों ने खुद मैदान पकड़ा, पुलिस का काम करते हुए खुद दंपती की घेराबंदी कर उन्हें जंजीरवाला चौराहे के पास पकड़ा तो जिम्मेदारों की नींद खुली। जन ने साहस दिखाकर धोखाधड़ी के संदेही को पकड़ा तो एरोड्रम व मल्हारगंज पुलिस ने अलग-अलग तीन केस दर्ज कर लिया।

केस दर्ज कराने वाले मल्हारगंज के दुर्गेश जाट ने बताया, लोगों ने पुलिस को शिकायत की थी और जब कार्रवाई नहीं हुई तो खुद आरोपितों को पकडक़र लाए। इसके बाद पुलिस ने केस दर्ज किया, हालांकि जिन लोगों के करोड़ों रुपए अटक गए है वे अब भी न्याय की आस लिए बैठे है।

परिजनों के संघर्ष के बाद शिल्पू को न्याय दिलाने आगे आई पुलिस
शिल्पू भदौरिया हत्याकांड भी संघर्ष की कहानी बयां करता है। अगस्त 2016 आरएनटी मार्ग के लेमन ट्री होटल से गिरकर शिल्पू की मौत हुई थी। पुलिस इसे हादसा मान रही थी। दबाव-प्रभाव जैसे सारे हथकंडे सफल होते नजर आ रहे थे। शिल्पू के दोस्त नीरज के साथ होटल गई थी। होटल के कमरे में नीरज के साथी ठहरे हुए थे और वहीं से शिल्पू गिरी थी। परिवार के लोग हत्या का आरोप लगा रहे थे लेकिन पुलिस ने इसे खारिज कर आत्महत्या के लिए मजबूर करने का केस दर्ज किया। शिल्पू के पिता ग्वालियर निवासी रमेश भदौरिया व अन्य परिजन इससे सहमत नहीं हुए। विरोध प्रदर्शन हुआ लेकिन पुलिस नहीं जागी तो न्याय की आस में पिता ने कोर्ट की शरण ली। आखिरकार पुलिस ने हत्या का मामला माना और धारा बढ़ा दी। मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है।

डीपीएस हादसा: न्याय की आस में उमड़ा शहर

बायपास का डीपीएस हादसा भी लोगों की जागरुकता व संघर्ष का एक बड़ा उदाहरण है। बस हादसे में चार बच्चों की मौत हुई तो पुलिस ने ड्राइवर पर केस दर्ज कर लिया। इस घटना से बच्चों के परिवार के साथ पूरा शहर खड़ा हो गया। जागरुक लोगों का फोरम बना, चौराहों पर जमा होकर कैंडल मार्च कर बच्चों को श्रद्धांजलि दी। लोगों का संघर्ष इस बात को लेकर था कि भविष्य में इस तरह के हादसे न हो। लोगों की जागरुकता व एकजुटता का परिणाम था कि स्कूलों में स्पीड गर्वनर, जीपीएस व सीट बेल्ट लगाने जैसे नियमों का नोटिफिकेशन हुआ। ताकतवर स्कूल लॉबी के सामने प्रशासन सख्त हुआ और सिरों से बसों के परमिट निरस्त हुए। 15 साल पुरानी बसों को भी बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। पुलिस ने स्पीड गर्वनर लगाने वालों को पकड़ा, स्कूल की लापरवाही की मजिस्ट्रियल जांच चल रही है लेेकिन नियमों में बदलाव से उम्मीद बंधी है कि भविष्य में नौनिहालों को लाने वाली स्कूल बसों में इस तरह की लापरवाही तो नहीं रहेगी।

 

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