नौकरी के फ्रंट पर नाकाम रही मोदी सरकार

सरकार ने वर्ष 2022 तक कृषि पर निर्भर गरीब लोगों के प्रतिशत को 49 से कम कर 18 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा था

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Published: 15 Jun 2016, 09:01 AM IST

नई दिल्ली। बेहतर ग्रोथ रेट के वादों और नौकरियों के सपने दिखाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो साल पहले सत्ता में आए थे, लेकिन आंकड़ों के आईने में देखें तो सरकार न सिर्फ अपने लक्ष्यों से काफी पीछे है, बल्कि इस फ्रंट पर वह लगातार संघर्ष करती दिख रही है। नेशनल स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल एनएसडीसी का अनुमान था कि ताबड़तोड़ सरकारी कोशिशों के बलबूते रोजगार के लाखों अवसरों का सृजन होगा। इससे न सिर्फ जॉब मार्केट में एंट्री करने वालों को फायदा होगा, बल्कि 2022 तक कृषि पर निर्भर गरीब लोगों का प्रतिशत भी कम होकर वर्तमान 49 से 18 प्रतिशत पर आ जाएगा, लेकिन नतीजे
वही ढाक के तीन पात।

बाध्य होकर सरकार को नए लक्ष्य सामने रखने पड़े हैं। हालांकि, एक्सपर्ट का कहना है कि सरकार के लिए नए लक्ष्यों को हासिल करना भी संभव नहीं है। सरकार ने अब अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य में बड़ी कमी करते हुए 18 फीसदी को 38 फीसदी कर दिया है। यानी सरकार का लक्ष्य अब रोजगार के सृजन के जरिए कृषि पर आधारित लोगों के प्रतिशत को 49 से कम करके 38 प्रतिशत करना है।

एनएसडीसी का अब मानना है कि 2022 तक कृषि पर जीविका के लिए आधारित सिर्फ 2.5 करोड़ लोग ही उसे छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस समेत अन्य सेक्टर की तरफ रुख कर पाएंगे। जबकि पहले सरकार का यह लक्ष्य 15.8 करोड़ लोग था। इस तरह सरकार अपने लक्ष्य में नाकाम रही है।

आठ प्रमुख सेक्टर में महज 7 लाख जॉब

लेबर ब्यूरो की ओर से जिन आठ प्रमुख सेक्टर से जुड़े जॉब संबंधी आंकड़े हाल में जुटाए गए हैं, उनके अनुसार पिछले लगभग दो साल के दौरान महज 7 लाख जॉब ही क्रिएट की गई। जबकि ये सारे सेक्टर जॉब इंटेंसिव माने जाते हैं। जेएनयू के प्रोफेसर डॉ संतोष मेहरोत्रा ने कहा कि सरकार के लिए नए लक्ष्यों को हासिल करना भी मुश्किल है। इसी दो वजहें हैं— पहली, पिछले फाइनेंशियल ईयर के दौरान जीडीपी ग्रोथ रेट बेशक 7.6 प्रतिशत रही, लेकिन इसके कारण निवेश, बिजनेस एक्टिविटी, प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट—इम्पोर्ट में इजाफा नहीं हैं।
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