Miraculous marble: इन वादियों में अपने आप रंग बदलते हैं पहाड़... सम्मोहित हो जाते हैं सैलानी

Premshankar Tiwari

Publish: Nov, 14 2017 08:49:21 (IST)

Jabalpur, Madhya Pradesh, India
Miraculous marble: इन वादियों में अपने आप रंग बदलते हैं पहाड़... सम्मोहित हो जाते हैं सैलानी

तीन किलोमीटर तक संगमरमरी चट्टानों के बीच से बहती है नर्मदा, विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं है प्रकृति की ऐसी चित्रकारी

जबलपुर। भारत की पश्चिमी पर्वत माला (पश्चिमी घाट) को यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल किया है। तकरीबन 1600 किलोमीटर की यह पर्वत श्रंखला अपने आप में अनूठी व अद्भुत है, लेकिन जबलपुर के आंचल को प्रकृति ने इससे भी बड़ी सौगात दी है। युगों पुरानी यह सौगात है, भेड़ाघाट की संगमरमरीवादी...। यहां नर्मदा का प्रवाह संगमर की चट्टानों को चीरता हुआ आगे बढ़ता है। संगमरमर के पहाड़ अपने आप रंग बदलते हैं। मद्धिम धूप के बीच सर्दियों के मौसम में इनका आकर्षण और बढ़ जाता है। प्रकृति की इस अनुपम संरचना को देखने के लिए हजारों सैलानी भेड़ाघाट पहुंचते हैं। मौसम सर्दियों का है आइए, आपको भी संगमरमरी वादियों के अद्भुत सौंदर्य से परिचित कराते हैं।

तीन बार बदलता है रंग
जबलपुर से तकरीबन २० किलोमीटर दूर भोपाल की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसे भेड़ाघाट में प्रवेश करते ही ऐसे पहाड़ देखने मिलते हैं जो अपना रंग समय के साथ बदलते हैं। आप चाहें तो सुबह से रात तक एक ही दिन में इनके रंगों को अपनी आंखों से देख सकते हैं। दरअसल, मार्बल के ये पत्थर धूप पडऩे पर चमकने लगते हैं और सूर्याेदय के साथ जैसे-जैसे सूरज चढ़ता व ढलता जाता है, इनका रंग भी उसके अनुसार परिवर्तित होता जाता है, जो कि लाल, नीला, हरा सहित सतरंगी भी दिखाई देता है। देर रात चंद्रमा के निकलने पर भी ये पहाड़ अपने आप रंग बदलते हैं। शरद पूर्णिमा की रात यहां का दृश्य आलौकिक रहता है। स्वच्छ चांदनी में पहाड़ चमकते नजर आते हैं। इन्हें देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग भेड़ाघाट पहुंचते हैं। कई लोग पूर्णिमा की रात यहां नौकाविहार का भी आनंद लेते हैं।

भूल भुलैया का जादू
कई मीटर ऊंची संगमरमर की पहाडिय़ों के बीच नमज़्दा के प्रवास में एक ऐसा स्थान भी है जहां से रास्ता ही समझ में नहीं आता। यहां नर्मदा कई भागों में बंटी हुई नजर आती है। वापस किस तरफ जाना है, यह बात लोगों को पशोपेश में डाल देती है। हालांकि यहां नावों के सहारे जाना होता है। नाविक हर डगर को भली भांति जानते हैं। लेकिन जब वे नौकाविहार कर रहे लोगों से सवाल करते हैं कि अब बताइए हम किस तरफ से यहां आए हैं और कहां से वापस जाएंगे? तो लोग निरुत्तर और हैरान रह जाते हैं। यहां दूर-दूर तक सिर्फ पानी और मार्बल के पहाड़ ही दिखते हैं। यही वजह है कि इसे भूल भुलैया कहा जाता है। यह स्थान देखने की चाह रखने वाले किसी पारंगत नाविक के साथ ही यहां पहुंचते हैं।

बंदर कूदनी का रहस्य
नौका विहार के दौरान करीब एक किलोमीटर के सफर के बाद संगमरमर की चट्टानों से घिरा एक स्थान आता है, जिसे बंदर कूदनी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान से कभी बंदर इस पार से उस पार कूद जाते थे। यहां लाल, पीले और नीले रंग के संगमरमर पर प्रकृति की अद्भुत कलाकारी लोगों को सम्मोहन में बांध लेती है। नाविक जब देशी अंदाज में शेरो-शायरी के माध्यम से इस जगह के गुणों का बखान करते हैं तो पर्यटक खिलखिला उठते हैं।

चट्टानों के बीच में नदी
भेड़ाघाट में धुंआधार जलप्रपात से सरस्वती घाट तक करीब ढाई से 3 किलोमीटर की लम्बाई में नर्मदा संगमरमर की चट्टानों की बीच से बहती है। ऐसा दृश्य और संगमरमरी सौंदर्य अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। यहां पंचवटी, भूल-भुलैया, स्वर्गद्वारी आदि में प्रकृति की जो चित्रकारी है वह विश्व में और कहीं भी देखने नहीं मिलती। दूध की तरह धाराएं और फुहारा छोड़ता धुंआधार जलप्रताप भी अपने आप में अद्भुत है। दसवीं सदी का गौरीशंकर मंदिर और 64 योगिनी मंदिर भी अनुपम है। संगमरमरीवादी का विश्व पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिए इतिहासकार राजकुमार गुप्ता ने प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा है। उन्होंने पीएम मोदी को संगमरमरीवादी की सैर के लिए आमंत्रित भी किया है।

विश्व धरोहर क्यों नहीं?
इतिहासकार राजकुमारी गुप्ता का कहना है कि संगमरीमरी सौंदर्य के ही समीप लम्हेघाट में अनूठी चट्टानें हैं। वैज्ञानिकों और शोधार्थियों के बीच लम्हेटा रॉक के नाम से फेमस ये चट्टानें 1 करोड़ वर्ष से भी अधिक प्राचीन हैं। 18 वीं सदी का ओपेरा हाउस यदि विश्व धरोहर बन सकता है तो फिर 10 वीं का गौरीशंकर मंदिर, 64 योगिनी, संगमरमरी सौंदर्य और लम्हेघाट की अद्वितीय चट्टानें इस श्रेणी में क्यों नहीं आ रही हैं।

ये होगा फायदा
श्री गुप्ता का कहना है कि यदि लम्हेटा रॉक, 10 वीं का गौरीशंकर मंदिर, 64 योगिनी और संगमरमरी वादियां विश्व धरोहर में शुमार हो जाएंगी तो जबलपुर का पर्यटन विश्व पटल पर आ जाएगा। विदेशों से शोधार्थियों और वैज्ञानिकों के साथ हजारों की संख्या में सैलानी भी जबलपुर पहुंचेंगे। इससे लोगों की आय और जबलपुर का कद भी बढ़ेगा। उसका खोया हुआ प्राचीन गौरव फिर वापस लौट आएगा। इसके लिए जबलपुर के ही नहीं पूरे प्रदेश के जनप्रतिनिधियों को एक मंच पर आकर प्रयास करना चाहिए।

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