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जबलपुर

मां अन्नपूर्णा का न हो अपमान, नर्मदा माई का बना रहे मान- फोटो है

मां अन्नपूर्णा का न हो अपमान, नर्मदा माई का बना रहे मान- फोटो है

जबलपुरMay 11, 2024 / 12:54 pm

Lalit kostha

मां अन्नपूर्णा का न हो अपमान, नर्मदा माई का बना रहे मान- फोटो है

annapurna sewa in jilehrighat

जबलपुर. मां अन्नपूर्णा का न हो अपमान, माई नर्मदा का भी बना रहे मान…कुछ ऐसा ही संदेश देते हुए पिछले 15 दिनों से नर्मदा भक्तों की एक मुहिम चल रही है। वे हजारों लोगों को भोजन तो कराते ही हैं, साथ में उन्हें मां नर्मदा को निर्मल और स्वच्छ रखने का संदेश भी देते हैं। यही नहीं भोजन का एक भी दाना व्यर्थ न हो इसके लिए भी वे एक-एक के पास जाकर उसके सदुपयोग की अपील भी कर रहे हैं। ये नजारा नर्मदा तट जिलहरी घाट का है। जहां पूरे साल सेवाएं देने वाले नर्मदा भक्तों द्वारा बैसाख माह के अवसर पर हर साल प्रतिदिन भंडारा प्रसाद वितरण किया जाता है और यहां आने वालों को प्रेरित भी किया जाता है।
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  • जिलहरीघाट में बैसाख महीने के अवसर पर रोज हो रहा भंडारा
  • दे रहे प्रदूषण मुक्त नर्मदा, अन्न अपमान मुक्त भोजन का संदेश
  • जिलहरी घाट में नित्य तैराकी मंडल एवं मां रेवा समिति कराती है कई सालों से बैसाख महीने में प्रतिदिन भंडारा
  • प्लास्टिक के दोने पत्तलों की अपेक्षा थाली, प्लेट का उपयोग
  • रोजाना करीब दो हजार से ज्यादा लोगों को करा रहे भोजन
एक एक दाने की कीमत, माई का अपमान न हो
मां रेवा समिति के धीरज गांधी, अज्जू सराफ ने बताया समिति के सदस्यों द्वारा पूरे महीने सुबह 8 बजे से 12 बजे तक भंडारा प्रसाद का वितरण किया जाता है। लोगों को मां अन्नपूर्णा के एक-एक दाने की कीमत भी लोगों को बताते हैं। ताकि वे अन्न का अपमान न करें और उसकी असल कीमत को समझें। हम लोगों से यह भी कहते हैं कि केवल भंडारा, पार्टी ही नहीं घर पर भी अनाज के एक-एक दाने को व्यर्थ न करने की अपील करते हैं। इस पुण्य कार्य में विशाल साहनी, राजदीप ठाकुर, गोलू मिश्रा, शशिराज, शैलेंन्द्र सोनी, अमित प्रजापति आदि सहयोग करते हैं।
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निर्मल नर्मदा का दे रहे संदेश
इसी घाट पर नित्य तैराकी मंडल के सदस्यों द्वारा भी रोज अलग-अलग पकवान बनाकर नर्मदा भक्तों को प्रसाद परोसा जा रहा है। शुक्रवार को खीर, पुड़ी, सब्जी, चावल का भंडारा प्रसाद वितरित किया गया। समिति के शंकर श्रीवास्तव ने बताया नित्य तैराकी मंडल के सदस्य हर एक नर्मदा तट आने वाले से गंदगी नहीं करने, प्लास्टिक, दोना पत्तल आदि का उपयोग नहीं करते हैं। दोनों समितियों के सदस्यों ने स्टील की थालियां, चम्मच, क्रॉकरी के कटोरे प्लेट आदि खरीद रखे हैं। जिनमें श्रद्धालुओं को भंडारा प्रसाद परोसा जाता है। यही नहीं उनसे ही उपयोग किए गए बर्तन को धुलने का आग्रह भी करते हैं, ताकि वे खुद देख सकें कि अन्नपूर्णा का अपमान तो नहीं हुआ। यहां प्रतिदिन करीब दो हजार लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसमें व्यर्थ भोजन की बात करें तो न के बराबर ही निकलता है। जो थोड़ा बहुत अन्न निकलता है, वह गायों को खिला दिया जाता है।
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स्वयं बनाते हैं भोजन
दोनों समिति के सदस्यों द्वारा सुबह 6 बजे से भोजन प्रसाद बनवाने का क्रम शुरू हो जाता है। इसके लिए अलग से कोई रसोइया नहीं लगाया गया है, बल्कि सदस्य स्वयं मिल-जुलकर भोजन प्रसादी बनाते हैं। उनका मानना है कि अपने हाथों से बनाया अन्नपूर्णा का प्रसाद वितरित करने का अलग ही आनंद है।

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