पर्यावरण विभाग को नहीं दिख रही गाजर घास

पर्यावरण विभाग को नहीं दिख रही गाजर घास
Carrot grass is becoming the epidemic

Jabalpur Online | Updated: 19 Sep 2015, 10:54:00 AM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

गाजर घास बनती जा रही है महामारी, चर्म रोगों से लोगों को हो रही परेशानी

जबलपुर। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के युवा प्रकोष्ठ ने मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल, नगरीय प्रशासन व पर्यावरण विभाग को पत्र लिख कर आरोप लगाया है कि प्रशासन की लापरवाही के चलते शहर सहित पूरे राज्य में गाजर घास महामारी की तरह फैल गई है। मंच के सदस्यों, पदाधिकारियों ने उसका उन्मूलन किए जाने की मांग की है। मंच के मनीष शर्मा, रानी जायसवाल, राकेश चक्रवर्र्ती, बीना सिंह, गौरव अरोरा, सुरेंद्र सैनी, साजिद खान, प्रफुल्ल सक्सेना आदि ने बताया कि एक शोध के अनुसार गाजर घास श्वसन तंत्र से संबंधित कई गंभीर बीमारियों का कारण बनती है। जानवरों पर भी इसका कुप्रभाव पड़ता है।
इसकी वजह से अन्य पौधे पनप नहीं पाते, जिससे फसलों को नुकसान होता है। मंच ने चेताया है कि सरकार जल्द ही इसके उन्मूलन के लिए ठोस उपाय नहीं अपनाती है तो इस संबंध में हाईकोर्ट की शरण ली जाएगी।
कैसे पहचाने
हर प्रकार के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता वाली गाजर घास एक षाकीय पौधा है जो 90 सेंमी से 1.0 मी. ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां गाजर या गुलदाउदी की पत्तियों की तरह होती हैं। पौधे साल भर उगते हैं। फूल सफेद रंग के छोटे-छोटे तथा शाखाओं के शीर्ष पर लगते हैं। फूल और बीज पौधों पर हर मौसम में आते हैं। प्रत्येक पौधा पांच हजार से पच्चीस हजार की संख्या में बीज प्रतिवर्ष पैदा कर सकता है।
कैसे फैलती है
गाजर घास का फैलाव मुख्यत: इसके बीजों द्वारा होता है जो खाद सिंचाई के पानी, हवा तथा वाहनों एवं रेल गाडिय़ों द्वारा एक के स्थान से दूसरें स्थान पर चले जाते है। यह घास मुख्यत: खुले स्थानों, औद्यौगिक क्षेत्रों, सड़कों तथा रेलवे लाइन के किनारे, अकृषित भूमि तथा मनुष्य के निवास स्थान के पास पायी जाती हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवेश पर इसके  कुप्रभाव
गाजर घास की वजह से मनुष्य में तरह-तरह के चमज़् रोग हो जाते हैं। पौधों के सम्पर्क में आने से खाज-खुजली होती है तथा गर्दन, चेहरे तथा बाहों की चमड़ी सख्त होकर फटने लगती है। इसके संपर्क में लगातार बने रहने पर शरीर की चमड़ी के ऊपर एक्जीमा की तरह प्रभाव पड़ता है। पौधे पर सर्वत्र घने रोएं पाए जाते हैं जो तेज हवा के चलने पर, पौधों के आपस में रगडऩे से टूट कर हवा के साथ उड़ते हैं। इसलिए जो लोग इस खरपतवार के सीधे सम्पर्क में नहीं आते हैं उन्हे भी चर्म रोग हो सकता है क्योंकि वातावरण में इसके रोएं उड़ते रहते हैं।

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