dairy farm: अवैध डेयरियों का मामला 19 वर्ष बाद अब एनजीटी के हवाले, ये होगा असर

हाईकोर्ट ने कहा- पर्यावरण प्रदूषण के मामले सुनने का अधिकार एनजीटी को

By: Premshankar Tiwari

Published: 18 Aug 2017, 08:00 PM IST

जबलपुर।  मप्र हाईकोर्ट ने उन्नीस साल पहले शहर में संचालित अवैध दूध डेयरियों से पर्यावरण प्रदूषित होने को लेकर दायर की गई जनहित याचिका नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के हवाले कर दी है। चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बेंच ने सुको के दिशानिर्देशों के तारतम्य में याचिका को एनजीटी की भोपाल बेंच भेजने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट रूम नंबर एक से डीबी क्रमांक एक के समक्ष सुनवाई हुई।
यह है मामला
1998 में नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि शहर में 299 अवैध डेयरियों का संचालन हो रहा है। इनमें नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है। इनसे निकलने वाले कचरे व होने वाले प्रदूषण से नर्मदा, परियट व गौर नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है। इन डेयरियों ने न तो प्रदूषण नियंत्रण मंडल से अनुमति ली है और ना ही नगर निगम से समुचित लायसेंस। इन्हें शहर व नदियों की प्रभाव सीमा से दूर करने की मांग की गई थी।
तीस बार आदेश हुए
याचिका की सुनवाई के दौरान समय-समय पर कोर्ट ने एेसे तीस आदेश जारी किए, जिनमें प्रशासन, नगर निगम व प्रदूषण मंडल को अवैध डेयरियों पर कार्रवाई के लिए निर्देशित किया गया। इन आदेशों के तहत हुई कार्रवाई के चलते ही डेयरियों को शहरी सीमा से बाहर करने के निर्देश दिए गए।
नीरी की रिपोर्ट नहीं मानी
कोर्ट ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरमेंट रिसर्च (नीरी) नागपुर से रिपोर्ट मंगाई थी। नीरी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि नदियों व जलस्त्रोतों से डेयरियों की कम से कम दूरी 500 मीटर होनी चाहिए। लेकिन इसे राज्य सरकार ने कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई डेयरी नीति में नहीं माना। इस पर कोर्ट ने मसले से जुड़े सभी पक्षकारों व अधिकारियों को बैठक कर इस समस्या का निराकरण निकालने को कहा था। यह बैठक हुई भी, लेकिन बेनतीजा रही।
हाईकोर्ट ने 17 फरवरी, 2017 को नगर निगम व प्रदूषण नियंत्रण मंडल को निर्देश दिए थे कि डेयरी संचालक इसके लिए आवश्यक अनुमति ले सकते हैं, लेकिन तय समय सीमा में। संचालकों के पंद्रह दिन के अंदर आवेदन पेश करने पर छह माह की अवधि में इनक ा निराकरण किया जाए।
ऐसे चली सुनवाई

कोर्ट : (याचिकाकर्ता से) कहिए क्या कहना है आपको?
याचिकाकर्ता डॉ नाजपांडे : माय लॉर्ड, डेयरी संचालकों से नगर निगम, प्रशासन व प्रदूषण नियंत्रण मंडल नियमों का पालन नहीं करवा पा रहे हैं। अभी तक कोर्ट के निर्देशानुसार अधिकांश डेयरियों ने वैधानिक लायसेंस व अनुमति नहीं ली है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के वकील : माय लॉर्ड, मंडल के समक्ष 71 डेयरी संचालकों ने (अवशिष्ट प्रबंधन प्लांट) ईटीपी के लिए आवेदन दिए हैं। इनमें से 31 के आवेदन स्वीकृत हुए हैं।
नगर निगम के वकील : माय लॉर्ड, अभी तक 31 डेयरी संचालकों ने लायसेंस के लिए आवेदन दिया है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ओर से एनओसी न मिलने की वजह से इनके आवेदन लंबित हैं।
अतिरिक्त महाधिवक्ता समदर्शी तिवारी : माय लॉर्ड, ये बातें सुप्रीम कोर्ट के 2012 के एक न्याय दृष्टांत के अनुसार गौण हो जाती हैं। सुको के दिशानिर्देशों के तहत पर्यावरण प्रदूषण से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई केवल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ही कर सकती है। लिहाजा यह मुकदमा हाईकोर्ट में चलने योग्य ही नहीं है।
कोर्ट : यस, एग्रीड। सुको के दिशानिर्देशों के तहत मामले को एनीजीटी ही भेजना उचित होगा।
याचिकाकर्ता डॉ नाजपांडे : माय लॉर्ड, यह याचिका मैंने 1998 में दायर की थी। उस समय मेरी आयु 60 वर्ष थी। अभी मैं उन्यासी साल का हूं। उन्नीस साल में कोर्ट ने लगातार इस मामले पर संवेदनशीलता दिखाई। अबसरकार नीति निर्धारण के अंतिम दौर में है, इसे एनजीटी ट्रांसफर करना उचित नहीं होगा।
कोर्ट- सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन अनिवार्य है। मामले को एनजीटी की भोपाल बेंच के समक्ष भेजने के निर्देश दिए जाते हैं।

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Premshankar Tiwari Desk
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