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कटंग से बनाई दूरी, अब दक्षिण भारतीय, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के बांसों की करेंगे खेती

किसानों की आय बढ़ाने के लिए उष्ण कटीबंधीय वन अनुसंधान केंद्र में लाई गईं 45 प्रजातियां

 

जबलपुर

Published: May 18, 2022 09:32:45 pm

वीरेन्द्र रजक @
जबलपुर. जबलपुर समेत आसपास के जिलों में दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा सहित अन्य प्रदेशों में पैदा होने वाले बांसों की खेती की जाएगी। टीएफआरआई (उष्ण कटीबंधीय वन अनुसंधान केंद्र) की ओर से देशभर में 45 प्रजातियों के बांसों का केंद्र में संग्रहण किया गया है। मौसम की अनुकूलता और मिट्टी की उपलब्धता के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर बांस की इन नई प्रजातियों की खेती कर उन्हें विकसित किया जा रहा है। इन बांसों से किसानों की आय बढ़ाने के लिए पेपर मिल संचालकों से टीएफआरआई ने अनुबंध भी किया है।
वर्तमान में इन्हें कर रहे प्रमोट : वलगेरिस, टुल्डा, न्यूटांस
यहां किया सर्वेक्षण : उमरिया, कुंडम, कटनी
यहां लगाए गईं ये प्रजातियां : उमरिया, मानपुर और कुंडम
क्षेत्रफल : 10 हेक्टेयर
इसलिए बनाते हैं दूरी
जानकारी के अनुसार जबलपुर और आसपास पैदा होने वाले बांस कटंग प्रजाति के होते हैं। इनमें कांटे होते हैं, इसलिए इनका नाम कटंग है। इन बांसों की कटाई के दौरान कई बार किसान बुरी तरह घायल हो जाते हैं, इसलिए वे इसकी खेती से दूरी बनाने लगे हैैं। किसान नई प्रजाति के बांसों की खेती कर सकें, इसलिए जबलपुर समेत आसपास के जिलों में इन पौधों को विकसित किया जा रहा है।
चार साल से 40 साल तक
जानकारी के अनुसार बांस की नई प्रजाति के पौधे चार से साढ़े चार साल में बड़े जाते हैं। इसके बाद इन्हें काटकर बेचा जा सकता है। एक पौधा न्यूनतम 40 साल तक लगातार बांस पैदा करता है। ऐसे में यदि किसान एक बार इन नई प्रजातियों का रोपण कर लें वे 40 साल तक इन्हें काटकर बेच सकते हैं।
पेपर मिल से समझौता
किसानों को बांस की नई प्रजाति की खेती से आय हो, इसके लिए जबलपुर और अमलाई की एक-एक पेपर मिल से समझौता भी किया गया है। टीएफआरआई के निदेशक डॉ. जी राजेश्ववर राय ने यह अनुबंध किया है।
वर्जन
किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से जबलपुर समेत आसपास के जिलों में बांस की नई प्रजातियों की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए टीएफआरआई ने एक पेपर मिल से अनुबंध भी किया है। इसके तहत किसानों की ओर से उपजाए गई बांसों की नई प्रजातियों को क्रय करने का जिक्र है। इससे बांस से जुड़े उद्योगों को और बढ़ावा मिलेगा।
डॉ. फातिमा शिरीन, वैज्ञानिक, विभागाध्यक्ष, जेनेटिक एंड ट्री इम्प्रूवमेंट डिवीजन, टीएफआरआई
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