इन पौधों में फलता है सिंदूरी रंग, अब बेरंग हो रहे पहाड़, हैरान कर देगा कारण

इन पौधों में फलता है सिंदूरी रंग, अब बेरंग हो रहे पहाड़, हैरान कर देगा कारण
Herbal coloring trees

Prem Shankar Tiwari | Publish: Mar, 11 2017 10:01:00 PM (IST) jabalpur

जंगलों में हर्बल रंग और सिंदूर के पेड़ों का हुआ सफाया, बचाने के लिए अब वन विभाग ने शुरू की कवायद

जबलपुर। रंगों का महापर्व दस्तक दे चुका है। एक दौर था जब प्रकृति का खिला-खिला रुप लोगों को खुद वसंत के स्वागत में भागीदार बनाता था। पेड़-पौधे अपने फूलों व फलों में प्राकृतिक प्राकृतिक रंगों की सौगात लेकर आते थे। इन्हीं रंगों से होली का त्यौहार मनाया जाता था। हर्बल कलर अब भी हैं, लेकिन इनकी सौगात देने वाले पेड़-पौधों का अस्तित्व संकट में है। वनों में अंधाधुंध कटाई के कारण खासकर सिंदूर के पेड़ लगातार घटते जा रहे हैं। आईए रंगों के पर्व पर आपको भी बताते हैं कि पौधे हमें किस तरह देते थे रंगों का उपहार...

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गायब हो रहे वृक्ष
पर्यावरण विद प्रो. एचबी पालन बताते हैं कि होली में पहले प्रकृतिक रंग ही बरसते थे। पलाश, शेमल व सिंदूर के फलों से तैयार रंग से लोग होली खेलते थे लेकिन हर्बल सिंदूर देने वाले पेड़ अब गायब हो रहे हैं। इससे होली पर निकलने वाला प्राकृतिक सिंदूर का रंगों में उपयोग तकरीबन बंद हो गया है।

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यहां हैं सिंदूर के पेड़

पर्यावरण विद विनोद दुबे का कहना है कि मंडला, डिंडोरी, अमरकंटक व आसपास सतपुड़ा और विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों में पहले सिंदूर के पौधे लहलहाते थे। अब विशेषकर सिंदूर के पेड़ों पर चोरों की नजर लग गई है। हालांकि अब जंगल में लगे सिंदूर के पेड़ों को काटने पर वन विभाग ने रोक दी है। यह रोक इसलिए लगी है क्योंकि इसका दोहन व्यवसायिक होने लगा था। वन विभाग ने अब सिंदूर के पेड़ को संरक्षित कर दिया है। विभाग का यह दावा है कि कमाई के लालच में होली त्योहार पर इसका सबसे ज्यादा उपयोग होता है। रंग निकालने के लिए बीज तोड़ते वक्त इनके पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है। इसके चलते जंगल में लगे सिंदूर करके पेड़ों पर निगरानी का शिकंजा कस गया है। जंगल में इन पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए बीजा रोपण और सहित सुरक्षा संबंधी व्यवस्था की गई है।

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बीजों से निकलता है रंग
सिंदूर के पेड़ करीब 20-25 फीट तक उंचाई के होते है। इसमें कांटेदार फली होती है। फली के अंदर मटर के आकार के छोटे-छोटे दाने होते हैं। ये लाल रंग के पराग से ढके होते है। जिन्हें मसलने पर लाल रंग/नारंगी/पीला निकलता है। सिंदूर के पेड़ को कमीला, रोरी, कपीला, कमूद, रैनी सोरिया के नाम से भी पहचाना जाता है। चीफ कंजरवेटर फॉरेस्ट रेणु सिंह के अनुसार सिंदूर के पेड़ों की संख्या कम है। ये संरक्षित प्रजाति में है। इनके वृक्ष बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे है।

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ऐसे बनते हैं हर्बल कलर
- सिंदूर के बीजों को मसलने या पीसने पर उनसे प्राकृतिक रंग निकलता है। होली पर पहले इसका ही इस्तेमाल होता था।
- पलाश के फूलों को पीसकर इसके रस को सुखा लिया जाता था। सूखने के बाद इसके रस को रंग के रुप में इस्तेमाल किया जाता था।
- पलाश के फूलों को सुखाने के बाद उनको पीसकर पाउडर तैयार किया जाता था। जंगलों से लगे गांवों में अब भी यह प्रक्रिया अपनाई जाती है।
- हल्दी को पीसकर पीला रंग तैयार किया जाता था। यह सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है।
- पहले लोग जामुन को सुखाकर रख लेत थे। होली पर इन जामुनों को पानी में भिगोने के बाद पीस लिया जाता था। इसमें कुछ औषधियां मिलाकर पक्का जामुनी रंग तैयार किया जाता था।
- ब्रज और वृंदावन में आज भी पलाश के फूलों से बने रंग से ही होली खेली जाती है।

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