बात राजनीतिक बंगले की है, बंगले में ही रहने दें, जनता सब देख रही है

जबलपुर में पूर्व मंत्री को एलॉट भवन बना राजनीतिक अखाड़ा

 

By: shyam bihari

Published: 28 May 2020, 09:26 PM IST

जबलपुर। कुछ महीने पहले तक मप्र में कांग्रेसे की सरकार थी। लम्बे समय बाद सरकार आई थी। कांग्रेस खेमा उत्साह में था। कार्यकर्ता जोश में थे। लगता था बहुत कुछ बदल जाएगा। कांग्रेसियों का दावा जोशीा था। उनके मुताबिक बदलाव बिजली के करंट की तरह हो रहे थे। फिर अचानक राजनीतिक बदलाव की बिजली कड़की। सत्ताधारी पार्टी की आंखें चुंधिया गईं। स्थिति सामान्य हुई तो प्रदेश में भाजपा की सरकार बन चुकी थी। एक खेमा सन्नाटे में चला गया। दूसरा खेमा सन्नाटे से उजाले में आ गया। कोरोना काल में भी राजनीतिक घटनाक्रम सही मायने में करंट की तरह दौड़ा

अब बात जबलपुर की करते हैं। जबलपुर महाकोशल का सबसे बड़ा शहर है। प्राकृतिक रूप से सम्पन्न है। राजनीतिक रूप से धनी है। कांग्रेस सरकार बनी थी, तो यहां से दो कैबिनेट मंत्री बनाए गए थे। वित्तमंत्री का पद भी शहर से ही था। दोनों मंत्रियों ने अपने कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिला दिया था कि अब पूरे शहर को बदल देंगे। हालांकि, आम जनता को यह नहीं बता पाए कि वे असल में क्या बदलना चाहते थे। जनता तो कहीं की भी हो, उम्मीदों पर अड़ी रहती है। यहां की भी अड़ी थी। लेकिन, जब सरकार बदली तो जबलपुर से एक भी मंत्री फिलहाल नहीं बना है। ऐसे में कांग्रेस वालों को यह कहने का मौका है कि भाजपा के शासन में महाकोशल के साथ हमेशा अन्याय होता है। अब एक पूर्व मंत्री भाजपा पर गलत परम्परा डालने का भी आरोप लगा रहे हैं। असल में इन पूर्व मंत्री ने पद पर रहते हुए जबलपुर शहर में एक बंगला अपने नाम एलॉट कराया था। सरकार बदलते ही उसे खाली करने का नोटिस तैर गया है। अब पूर्व मंत्री का कहना है कि यह राजनीतिक दुर्भावना है। मप्र कांग्रेस कमेटी ने भी बंगला खाली कराए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई है।
यह तो होना ही था
सरकारें बदलती हैं, तो बहुत कुछ अपने आप ही बदल जाता है। विकास कार्य भले न हों, पट्टिकाएं लग और उखड़ जाती हैं। भाजपा सरकार ने भी बताया कि वह परम्पराओं से अलग थोड़े ही है। भाजपा का यह कहना गलत हो सकता है कि उसने कुछ गलत नहीं किया। लेकिन, उसकी सोच को राजनीतिक आधार पर कम से कम कांग्रेस वाले कैसे गलत ठहरा सकते हैं? कांग्रेस को भाजपा वाले याद दिला रहे हैं कि कुछ दिन पहले की ही बात है कि कैसे गिन-गिनकर खास पदों पर अपने चहेतों को बिठाया गया था। इसलिए दोनों दलों की हालत एक जैसी है। दोनों अपने पक्ष में तर्क गढ़ लेते हैं। एक दूसरे में खामियां निकाल लेते हैं। दोनों की जनता की मजबूरी समझते हैं। मजबूर जनता भी घर बैठकर तमाशा देख रही है। उसे भी कहां फिकर सच में कुछ बदलने की।

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