come for help - कोहली बने मसीहा, जुल्फिकार के लिए किया ये बड़ा काम

इंसानियत को सलाम, युवा से लेकर बुजुर्ग कर रहे नेक काम, गजब की है इनकी सेवा

By: Lalit kostha

Updated: 26 Jan 2018, 03:33 PM IST

जबलपुर। किसी की इंसानियत मिसाल बनी तो किसी ने अनाथाश्रम में जाकर पढ़ाने का बीड़ा उठाया। कोई एक एेसा शख्स सामने आया जो देश की रक्षा में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों के बारे में सोच रहा है। ये वे लोग हैं, जो संस्कारधानी की आबोहवा में सांस ले रहे हैं। ये एेसे गण हैं, जिन्होंने अपने बहादुरी, मानवता और बेमिसाल कार्यों से बेहतर तंत्र का निर्माण करने की ठानी है।

उन बच्चों को पढ़ाना बन गया मकसद
एक बार अपना बर्थडे सेलिब्रेट करने के लिए सेवा भारती उखरी गए थे। वहां जब कुछ वक्त बिताया तो समझ आया कि इन बच्चों में टैलेंट है। वे सरकारी स्कूलों में जाते हैं, लेकिन उन्हें कुछ विषयों में परेशानी आती है। एेसे में निशि जायसवाल, भाग्यश्री मेमणे और उनके साथियों ने यह फैसला किया वे यहां रोजाना आएंगे और बच्चों को पढ़ाएंगे। शुभम पटेल, कुलदीप सिंह और विवेक झारिया भी इस नेक काम का हिस्सा हैं और वे रोजाना यहां के बच्चों को मैथ्स और इंग्लिश की क्लासेज दे रहे हैं। निशि ने बताया कि वे सभी साइंस कॉलेज के स्टूडेंट्स हैं। दोपहर में कॉलेज अटैंड करने के बाद वे बच्चों को रोजाना पढ़ाने जा रहे हैं।

पहरेदारों के परिवारों का कल्याण
विदेश में सालों गुजार देने के बाद डॉ. गोपाल हरि सिंघल अब संस्कारधानी में बस गए। उनके परिवार में एक बिग्रगेडियर और दो कर्नल रह चुके हैं। एेसे में सैनिकों के प्रति सम्मान और जुड़ाव हमेशा से रहा है। जबलपुर में कर्नल पीके वैद्य से मुलाकात हुई। सैनिकों के लिए कुछ करने का सोचा। फिर पिछले चार साल से हर साल सैनिक कल्याण बोर्ड के जरिए शहीदों के परिवार, वीर नारियों के लिए एक लाख रुपए की राशि देते हैं। डॉ. गोपाल का कहना है कि सेना के जवान जो हमारे लिए कर रहे हैं, उसके हिसाब से यह सहायता कुछ भी नहीं है।

जुल्फिकार के लिए मसीहा बने हरीश
गोरखपुर के एक व्यापारी बड़ौदा के एक युवक जुल्फिकार के लिए मसीहा बने। जुल्फिकार काम के सिलसिले में जबलपुर आए थे। रेलवे स्टेशन पर अचानक उन्हें हार्ट अटैक आया। उसी वक्त व्यापारी हरीश कोहली अपने बेटे को स्टेशन छोडऩे के गए थे। उन्होंने जब यह देखा तो तुरंत उस व्यक्ति की स्वेटर उतारी, कपड़े ढीले किए। अपने बेटे से कहा कि व्हील स्टेशन से व्हील चेयर लाओ। तुरंत उसे हॉस्पिटल लेकर गए। हरीश के जेब में उस वक्त ढाई हजार रुपए थे। खर्च की परवाह किए बिना वह उसे हॉस्पिटल ले गए। इलाज शुरू हो गया। बड़ौदा में रहने वाले उनके परिवार को फोन करके जानकारी दी। तब तक हरीश ने ४२ हजार रुपए का इंजेक्शन भी लगवाया, जिससे जुल्फिकार खतरे से बाहर आ गए।

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Lalit kostha Desk
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