script महाकोशल अंचल की फागों में बसे हैं भगवान राम, झलकती है आस्था | Lord Ram resides in forests of Mahakoshal region | Patrika News

महाकोशल अंचल की फागों में बसे हैं भगवान राम, झलकती है आस्था

locationजबलपुरPublished: Feb 01, 2024 07:48:32 pm

Submitted by:

shyam bihari

राम अवतारी फागों से बसंत का स्वागत करती हैं फाग टोलियां, ग्रामीण अंचल में अब भी जीवित है परम्परा

 

 

shree ram
shree ram

जबलपुर। भगवान श्रीराम संस्कारधानी सहित पूरे महाकोशल अंचल की लोक संस्कृति में गहराई तक बसे हैं। ‘खेली-खेली राम संग फाग अवध में, भरे कटोरा रंग केसरिया...’, अरे रूठो न सिया कहना मानो ..., अरे सीता ने गले मे बरमाला, जा दई राम खों डार...। भगवान श्रीराम पर आधारित ऐसे ही फाग गीत संस्कारधानी और जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत रूप से बसंत के आगमन का स्वागत करते हैं। शहर में अब फाग का चलन कम होने लगा है। लेकिन, गांवों में फागुन के आते ही फसल कटने के बाद उल्लास में मग्न फाग गवैयों की टोलियां ढोलक, झांझ, मंजीरों की ताल पर अपने आराध्य श्रीराम-सीता, राधा-कृष्ण और शकर-पार्वती के जीवन पर आधारित फागों की तान छेड़ेंगे। फाग की टोलियां पूरे फागुन मास घर-घर घूमकर फाग गाएंगी।

जगह जगह जाएंगी टोलियां
फाग गायक दीन भगत ने बताया कि फागुन माह के आरम्भ से ही फाग गायन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। फागुन माह व होली पर उनकी मंडली कई जगहों पर फाग गाने जाएगी। इस दौरान ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बनता है। ग्रामीण अंचल में भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित फागें बहुत पसंद की जाती हैं।

गांवों में ज्यादा महत्व
ग्रामीण फाग मंडली से जुड़े राजेश पुरी बताते हैं कि वे बीते वर्षों से फागुन में फाग की टोली के साथ गाते हैं। धीरे-धीरे शहरी क्षेत्र में इसका चलन कम हो रहा है। लेकिन ग्रामीण अंचल में अब भी फाग मंडली की तानों के बिना फागुन नहीं बीतता। उन्होंने बताया कि उनकी रिहर्सल जारी है। फागुन मास आते ही फाग गाने के लिए उनकी मंडली गांवों का रुख करेगी।

शहर में कम हुआ रुझान
फागुन की आहट आते ही कभी ढोलक की थाप व मंजीरों पर चारों ओर फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे। लेकिन आधुनिकता के दौर में आज के समय में शहरी क्षेत्र से यह परम्परा लुप्त सी हो रही है। दो दशक पूर्व तक माघ माह से ही शहरों में भी फागुनी आहट दिखने लगती थी। बसंत पंचमी के साथ ही मस्ती का आलम शुरू हो जाता था। मस्ती के रस में सराबोर गांवों में फागों की फड़बाजी होती थी। जवाबी फागों की यह शैली अरसे से समाप्त हो चुकी है। अब गांवों में ही फाग की महफिलों का नजारा देखने मे आता है।

कई तरह की फागें
लोगों का मानना है कि टीवी की मनोरंजन संस्कृति के चलते जहां पुरानी परम्पराएं दम तोड़ रही है, वहीं आज की युवा पीढ़ी पुरानी संस्कृतियों को सीखना नहीं चाहती। यही कारण है कि होली के त्योहार पर शहरी क्षेत्रों में फाग गायन अब खत्म सा होता जा रहा है। होली पर फाग गायन का विशेष महत्व है। फाग गायक दीन भगत कहते है कि फाग संगीत की एक विशेष कला है। इसमें रागों के साथ ताल का भी मेल होता है। गांवों में राम, श्याम अवतारी फागें अधिक गाई जाती हैं।

ट्रेंडिंग वीडियो