#changemakers : इस विधानसभा क्षेत्र में खेत और खलिहान बनेंगे चुनावी मुद्दा, खास है वजह

#changemakers : इस विधानसभा क्षेत्र में खेत और खलिहान बनेंगे चुनावी मुद्दा, खास है वजह

Prem Shankar Tiwari | Publish: Oct, 11 2018 09:21:31 PM (IST) | Updated: Oct, 11 2018 09:21:32 PM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

पाटन विधानसभा के मतदाताओं ने तैयार किया खास एजेंडा

जबलपुर। पत्रिका समूह के जन एजेंडा 2018-23 के तहत हर विधानसभा क्षेत्र के लोगों, जन संगठनों और समूहों ने बैठक करके आगामी विधानसभा चुनाव के लिए एक खाका तैयार किया है। पाटन विधानसभा सभा क्षेत्र के जन एजेंडा भी कई अहम मुद्दे निकलकर सामने आए हैं। धान, मटर और गेहूं के बम्पर उत्पादन वाली पाटन विधानसभा में इस बार भी खेत-खलिहान चुनावी मुद्दा रहेंगे। खरीदी केन्द्रों में अनिमितता, खरीदी गई उपज के भुगतान में विलम्ब, खेती के सहायक उद्योगों की कमी और बेहतर शिक्षण व्यवस्था व सुविधा सम्पन्न खेल मैदानों की कमी लोगों की जुबान पर है।

जन एजेंडा - पाटन विधानसभा

संभावित दावेदार :-
- अंकित जैन (चेंज मेकर)
- नीलेश अवस्थी (कांग्रेस)
- आशीष दुबे (भाजपा)


- पाटन क्षेत्र कृषि प्रधान क्षेत्र है। साथ ही आर्थिक रूप से संपन्न क्षेत्र में भी जाना जाता है। लेकिन आज क्षेत्र में रोजगार की समस्या बड़ा रूप लेती जा रही है। युवा खेती से दूर भाग रहा है तो वहीं किसान अपनी उपज का सही मूल्य और प्रसंस्करण यूनिट के लिए परेशान है। स्वास्थ्य और शिक्षा के समुचित संसाधन न होना भी यहां की एक बड़ी समस्या के रूप में सामने खड़े हैं।

- पाटन विधानसभा की आबादी भी लगातार बढ़ रही है। 3.33 लाख की आबादी पाटन में निवासरत है। इसमें करीब 2.38 मतदाता हैं। किसानी क्षेत्र होने के नाते यहां उद्योग धंधों की भारी कमी है। रोजगार के सीमित साधन होने के कारण 15 फीसदी आबादी अब शहरों की ओर पलायन करने लगी है।
- विधानसभा में अभी तक स्थानीय विधायक नहीं रहा। जो भी विधयक रहे वह शहरी क्षेत्र से आए। क्षेत्रीय जनता का कहना है इससे उन्हें अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के निराकरण के लिए शहर की और जाना पड़ता है। उन्हें पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें स्थानीय व्यक्ति चाहिए। चाहे वह किसी भी समाज किसी भी पार्टी का ही क्यो न हो लेकिन वह स्थानीय हो।

- पाटन विधानसभा के तहत पाटन, मझौली क्षेत्र में कोई भी उम्दा अस्पताल नहीं है। जो अस्पताल हैं वे सिर्फ मलहमपट्टी करने तक सीमित हैं। ऐसे में गंभीर बीमारी के इलाज के लिए कई किलोमीटर से जबलपुर भागकर आना पड़ता है। ऐसे ही हाल शिक्षा व्यवस्था के हैं। स्कूली शिक्षा के लिए प्राथमिक मिडिल हायरसेकेंडरी स्कूल तो हैं लेकिन उच्च शिक्षा के लिए मात्र एक ही डिग्री कॉलेज है। यह भी समस्याओं से ग्रस्त है।

- मझौली में प्राचीन विष्णुवाराह,घुघरा पिकनिक स्पॉट, निनांद फाल जैसे प्राकृतिक स्थलों का आज तक विकास नहीं हो सका। इन स्थलों को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। लेकिन न तो मंदिरों का ही कायाकल्प किया जा सका न ही स्थलों की ओर लोगों को आर्कषित किया गया।

- कूड़ा गांव में नदी पार करके बच्चों को स्कूल जाना पडता है। वर्षों से पुल नही बन सका। बारिश के समय पढ़ाई ठप हो जाती है। चाकौद, जुगिया, रमपुरा गांव के लोग आज भी कच्ची सड़क से आना जाना करते हैं। मझौली क्षे नगना, छापर, बज, माला जैसे गांव में सुविधाएं तो हैं लेकिन यह नाकाफी हैं। सर्वसुविधायुक्त सरकारी अस्पताल नहीं है। किसी घटना दुर्घटना में शहर की और भागना पड़ता है।

- नशा खोरी, अपराध का ग्राफ पाटन क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। शराब का अवैध कारोबार पुलिस संरक्षण में संचालित हो रहा है। युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ रही है। जनता परेशान है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। अंधेरा ढलते ही नशे का कारोबार क्षेत्र में धड़ल्ले से शुरू हो जाता है।

- कृषि प्रधान क्षेत्र में अनाज की प्रोसेसिंग यनिट नहीं है। क्षेत्रीय किसान लंबे समय से इसके लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। ताकि अनाज के उत्पादन के साथ ही इसका प्रसंस्करण भी किया जा सके। इसके लिए प्रस्ताव भी तैयार किए गए लेकिन कुछ नहीं हुआ।

- रोजगार के साधन न होने के कारण अब युवा किसानी से दूर हट रहा है। मझौली, पाटन ऐसे क्षेत्र हैं जहां सर्वाधिक गेहूं, मटर की पैदावार होती है। लेकिन इस पैदावार का उचित दोहन किसान नहीं कर पा रहे हैं। युवा वर्ग पारपंरिक खेती को अपनाने से कतरा रहा है। इसके लिए जरूरी है कि क्षेत्र में खेती को आर्कषक बनाया जाए।

- खेलों को प्रोत्साहित करने और गांव में छुपी खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए पाटन विधानसभा क्षेत्र में कोई भी उम्दा मिनी स्टेडियम नहीं है। कई बार खेल आयोजन नहीं हो पाते।

क्षेत्रीय जनों ने ये कहा

-हमारी मांग है कि स्थानीय प्रत्याशी हो। जो हमारे हर काम में हमारे साथ खड़ा रहे। हमें किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं हैं।
- आनंदमोहन पलहा, समाजसेवी

 

- कूडा गांव में स्कूल जाने के दौरान बच्चों को नदी पार करके आना जाना पड़ता है। बारिश में पानी ऊपर आ जाने से दो माह तक पढ़ाई बंद हो जाती है। पुल की मांग क्षेत्रीय जनों द्वारा लंबे समय से की जा रही है।
- कृष्णकांत शर्मा, शिक्षक

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