हाईकोर्ट में सुलझा १०० रुपए का विवाद, कोर्ट ने सुनाया यह अहम फैसला

हाईकोर्ट में सुलझा १०० रुपए का विवाद, कोर्ट ने सुनाया यह अहम फैसला

deepak deewan | Publish: May, 18 2018 08:41:59 AM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

- हुई बड़ी गफलत

जबलपुर. मप्र हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में संविधान के अनुच्छेद ३४८ की विशद व्याख्या की है। कोर्ट ने कहा कि हिन्दीभाषी राज्य में हिन्दी भाषा में लागू किए गए मूल एक्ट और उसके अंग्रेजी अनुवाद में विरोधाभास होने की दशा में मूल एक्ट की भाषावली ही सही मानी जाएगी। इसी के साथ चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बेंच ने मलाजखंड नगर परिषद की याचिका खारिज कर दी।


यह है मामला
मलाजखंड नगर परिषद सीएमओ, जिला बालाघाट की ओर से दायर इस याचिका में सिविल जज बैहर, बालाघाट की ओर से २१ जनवरी २०१७ को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। कहा गया कि हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के साथ लम्बित मामले में कोर्ट से इस प्रश्न का समाधान करने का आग्रह किया गया था कि टर्मिनल टैक्स विथ गुड्स एक्सपोर्टेड फ्र ॉम एमपी म्यूनिसिपल लिमिट्स रुल्स १९९६ के हिन्दी या अंग्रेजी रूपांतरण में से कौन सा ग्राह्य होगा? कोर्ट ने आदेश दिया था कि अंतिम विचारण के समय इस प्रश्न पर विचार होगा। परिषद की ओर से तर्क दिया गया कि अनुच्छेद ३४८(३) के तहत इसका अंग्रेजी अनुवाद लागू होना चाहिए।


यह कहा सरकार ने
सरकार की ओर से सुको व हाईकोर्ट के विभिन्न न्यायिक दृष्टांत पेश किए गए। तर्क दिया गया कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एेसे ही एक मामले में मूल भाषा में लागू एक्ट के पाठ को ही मान्यता दी है।
ये है मूल हिन्दी नियम
नियम-७ का मूल हिन्दी पाठ है कि समयसीमा में विवरणी पेश न करने पर 'देय कर से दस गुना के समतुल्य राशि अतिरिक्त देनी होगीÓ।
यह है अंग्रेजी अनुवाद
इसके राजपात्र में प्रकाशित अंग्रेजी अनुवाद के यह शब्द हैं 'द अमाउंट इक्वल टू टेन टाइम्स ऑफ दि टैक्स शैल बी पेयेबलÓ। अंग्रेजी रूपांतरण के अनुसार यदि देय कर १०० रूपए है तो विवरणी समय पर पेश न करने पर दस गुना अर्थात १००० रुपए देय होगा। जबकि हिंदी नियम के अनुसार १०० रु देय कर होने पर इसका दस गुना अर्थात १००० रुपए इस राशि के अतिरिक्त देय होगा। अर्थात ११०० रुपए देना होगा।


एेसे हुआ विरोधाभास
अनुच्छेद ३४८ ( ३)के अंतर्गत अधिकृत अनुवादित पाठ कार्यपालिका का प्रशासनिक शक्तियों के प्रयोग में किया गया कार्य है, न कि विधायिका की शक्ति के प्रयोग में लागू विनियमन में।
हिंदी भाषी राज्य में विधायिका द्वारा हिंदी में ही लागू एक्ट पर अंग्रेजी अनुवाद लागू नहीं हो सकता।
अनुवाद का राज्यपाल की अनुमति से ही राजपत्र में प्रकाशन होता है, परंतु मूल एक्ट विधायिका द्वारा निर्मित व राज्यपाल द्वारा अनुमोदित होता है।

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