मेडिकल यूनिवर्सिटी में गोपनीयता भंग, अंकों में फेरबदल की आशंका, इस बाबू का नाम सामने आया

नियमों को ताक पर रख अधिकारी कर रहे कामकाज
सात साल से गोपनीय विभाग में एक ही कुर्सी पर जमा बाबू

By: Lalit kostha

Published: 29 Jun 2021, 01:47 PM IST

जबलपुर। मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (एमयू) के कामकाज को हाइटेक बनाने की आड़ में सारे नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए हैं। फेल-पास के गम्भीर आरोपों से घिरे विश्वविद्यालय के गोपनीय विभाग में एक बाबू सात साल से एक ही कुर्सी पर जमा हुआ है। यही बाबू, निजी कम्पनी के साथ मिलकर रिजल्ट प्रक्रिया पूरी कर रहा है। सम्बंधित कर्मचारी की कार्यप्रणाली को चिकित्सा शिक्षा विभाग के निर्देश पर कराई गई जांच में संदिग्ध पाया गया है। लम्बे समय तक गोपनीय विभाग में कर्मचारी की पदस्थापना से विश्वविद्यालय में मिलीभगत के गठजोड़ की जड़ें गहरी होने की आशंका बन गई है।

गोपनीयता भंग, अंकों में फेरबदल की आशंका
लम्बे समय से एक ही कर्मी की तैनाती से परीक्षा परिणाम की प्रक्रिया में विश्वविद्यालय के नियम लागू करने में मनमानी हुई। निजी कम्पनी को भी गड़बड़ी की छूट मिली। सूत्रों के अनुसार चिकित्सा शिक्षा विभाग के निर्देश पर की गई जांच में पाया गया है कि रिजल्ट बनाने वाली ठेका कम्पनी को परिणाम सम्बंधी ब्योरा परीक्षा नियंत्रक को मेल किया जाना चाहिए था। लेकिन, कम्पनी ने तृतीय श्रेणी कर्मी के ई-मेल पर जानकारी भेजी। इससे परिणाम की घोषणा से पहले ही गोपनीयता भंग हुई। छात्रों के परीक्षा के प्राप्तांक एक्सेल फारमेट में भेजे गए। निर्धारित इंटरफेस नहीं होने से अंकों में फेरबदल की आशंका है।

 

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रिजल्ट कमेटी में भी चहेते
गोपनीय विभाग में एक ही कर्मी के जमे होने से रिजल्ट कमेटी के सदस्यों के साथ भी एक गठजोड़ बन गया है। सूत्रों के अनुसार रिजल्ट प्रक्रिया से सम्बंधित स्क्रूटनी और टेबुलेशन कार्यों में लगातार कुछ चहेतों को जगह मिल रही है। कुछ विषयों में चुनिंदा विशेषज्ञों को ही परिणाम सम्बंधी कार्य में लिया जा रहा है। इसके बावजूद गोपनीय विभाग की विस्तृत जांच नहीं कराए जाने से विवि की कार्यप्रणाली संदिग्ध है।

किस्मत-अस्मत जांच में दो साल में बदलाव की थी सिफारिश
मेडिकल परीक्षाओं में फेल-पास के कुछ वर्ष पूर्व रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में उजागर हुए ‘किस्मत के बदले अस्मत’ मामले में गठित उच्च स्तरीय समिति ने परीक्षा परिणाम में गड़बड़ी रोकने के लिए कुछ सिफारिशें की थी। इसमें गोपनीय विभाग के कामकाज को ध्यान में रखकर कई सुझाव दिए गए थे। सबसे अहम सुझाव यह था कि गोपनीय विभाग में किसी कर्मचारी को दो साल से ज्यादा पदस्थ न किया जाए, जिससे पारदर्शिता बनी रहे। समिति को छानबीन में लम्बी पदस्थापना पर साठगांठ और मिलीभगत से अंकों में फेरबदल और फेल-पास जैसी गड़बडिय़ां मिली थीं।

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