नर्मदा के इस तट पर मां गौरी ने की थी तपस्या, हर कण में समाया है रहस्य, देखें वीडियो

Prem Shankar Tiwari

Publish: Jan, 31 2019 05:28:58 PM (IST) | Updated: Jan, 31 2019 05:28:59 PM (IST)

Jabalpur, Jabalpur, Madhya Pradesh, India

जबलपुर। नर्मदा को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कहा जाता है। शास्त्रों में लिखा है कि यह विश्व की सबसे प्राचीन नदी हैं। इनकी उत्पत्ति महादेव के पसीने की बूंद से हुई थी, इसलिए इन्हें शिव सुता भी कहा जाता है। जेडएसआई की रिपोर्ट के अनुसार विज्ञान ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि नर्मदा का अस्तित्व बेहदर प्राचीन है। सृष्टि का पहला प्राणी नर्मदा वैली में ही जन्मा था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि जो पुण्य गंगा में स्नान करने से मिलता है, उतना पुण्य नर्मदा के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। नर्मदा तीरे तपस्कुर्यात, मरणं जान्हवी तटे.... की उक्ति के अनुसार यहां वैदिक काल से ही साधू-सन्यासी तपस्या करते रहे हैं और तो और यह महादेव भगवान शिव की भी तपोस्थली रही है। यही कारण है कि इस पुण्य सलिला के हर घाट से कोई न कोई रोचक तथ्य जुड़ा हुआ है। ग्वारीघाट के बारे में तो यह कहा जाता है कि यहां पर स्वयं मां गौरी ने तपस्या की थी।

ग्वारीघाट में मां गौर ने किया तप
नर्मदा तीर्थ के नाम से विख्यात जबलपुर के मुख्य नर्मदा तट ग्वारीघाट को लेकर एक किंवदंति जुड़ी है। नर्मदा चिंतक स्व. द्वारिका नाथ शास्त्री ने अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि ग्वारीघाट तट पर माता गौरी यानि मां पार्वती ने तपस्या की थी। उनकी स्मृति को दर्शाता गौरी कुंड यहां आज भी मौजूद है। शुरुआत में ग्वारीघाट को गौरीघाट के नाम से जाना था, जो कालांतर में बदलकर ग्वारीघाट हो गया है। इस घाट पर रोजाना हजारों की संख्या में नर्मदा व शिव पार्वती के भक्त स्नान पूजन आदि के लिए पहुंचते हैं। माघ महोत्सव के आयोजनों के बीच सोमवती अमावस्या पर 4 फरवरी को फिर यहां श्रद्धालुओं का मेला रहेगा।

शिवलिंग के लिए स्वयं बनी जिलहरी
ग्वारीघाट से बांयी ओर कुछ दूरी पर स्थित नर्मदा का एक और प्राचीन घाट है। इस घाट की कहानी शिवलिंग से जुड़ी है। ऐसा माना जाता है कि यहां भगवान शिव की पिंडी स्थापित होने के लिए घाट के पत्थरों से जिलहरी स्वयं निर्मित हो गई थी, जो आज भी मौजूद है। इसलिए इस घाट को जिलहरी घाट कहा जाने लगा। यहां भी मकर संक्रांति पर श्रद्धालुओं का मेला रहा।

कर कंकड़ में शंकर
शास्त्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नर्मदा के हर कंकड़ को शंकर की उपाधि प्राप्त है। माना जाता है कि नर्मदा ने निकले कंकड़ों यानी नर्मदेश्वर की प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें स्वयं शिव स्वरूप और प्रतिष्ठित माना गया है। लोग ग्वारीघाट से इन पवित्र नमर्देश्वरों को एकत्रित करके श्रद्धा पूर्वक अपने घर ले जाते हैं और पूजन वंदन करते हैं। मान्यता है कि जिस घर में नर्मदेश्वर और शालिगराम का नियमित पूजन होता है, वहां नकारात्मक शक्तियों कभी झांक भी नहीं पातीं।

सोमवार को उमड़ेगी भीड़
नर्मदा तट पर इस समय माघ महोत्सव का आयोजन हो रहा है। भारी संख्या में तपस्वी और श्रद्धालु यहां एकत्रित हैं। माघ महोत्सव के क्रम में 4 फरवरी को बेहद अहम माना जा रहा है। दरअसल दिन माघी अमावस्या है। इसे मौनी अमावस्या भी कहा जाता है। इस बार यह पवित्र तिथि सोमवार को आ रही है। इसे सोमवती अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन नर्मदा में स्नान, तर्पण और दान का विशेष महत्व है। यही कारण है सोमवती अमावस्या पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे। इसके लिए तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। माना जाता है कि इस दिन यहां तर्पण करने से पितरों को शांति मिलती है, वहीं अमावस्या पर किया गया दान विघ्नों का हरण करता है।

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