scriptNo monitoring system: MRP of generics is more than ethical | जेनरिक दवाएं सस्ती, लेकिन दुकानदारों के मनमर्जी दाम पर खरीदने की मजबूरी | Patrika News

जेनरिक दवाएं सस्ती, लेकिन दुकानदारों के मनमर्जी दाम पर खरीदने की मजबूरी

निगरानी का सिस्टम नहीं: जेनरिक की एमआरपी एथिकल से भी ज्यादा

 

यह है स्थिति

●जेनरिक दवाओं थोक व फुटकर दाम में भारी अंतर

●जेनरिक दवाओं के रेट पर कोई नियंत्रण नहीं, मनमर्जी के रेट

●दुकानों में लगे 20 से 70 प्रतिशत तक डिस्काउंट के बोर्ड

जबलपुर

Published: May 07, 2022 09:35:24 pm

मनीष गर्ग

patrika.com

जबलपुर.

जेनरिक दवाओं को प्रोत्साहित करने के दावों के बीच भी सस्ती जेनरिक दवाएं आम आदमी से दूर हैं। इनकी कीमत पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं है। इसके चलते थोक व फुटकर दाम में भारी अंतर है। 150 रुपए की एमआरपी वाला थोक में जो जेनरिक दवा का पत्ता 10 से 20 रुपए के बीच में मिलता है, वह फुटकर में 100 रुपए तक का मिलता है।
generic medicines
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रेट में अंतर होने से मरीज यह तय नहीं कर पाता कि वह मनमानी छूट वाली जेनरिक दवा लेकर राहत महसूस करे कि अपने को ठगा हुआ माने। 80 फीसदी जेनरिक दवाओं के रैपर में एमआरपी एथिकल दवाओं की तरह या उनसे कहीं ज्यादा है। जानकार बताते हैं कि एथिकल और जेनरिक दोनों ही दवा कंपनियां साल्ट एक होते हैं, लेकिन खेल कंपनी के ब्रांडेड व जेनरिक नाम से हो रहा है। बाजार में जो एथिकल ब्रांडेड दवाएं हैं, उनके दाम पूरे देश में एक है और थोक व फुटकर का कमीशन भी फिक्स रहता है, जो कि 10 से 35 प्रतिशत तक रहता है।
मार्जिन की सीमा तय नहीं

सस्ती कही जाने वाली जेनरिक दवा के रेपर में जो उसकी कीमत दर्ज होती है, वह ब्रांडेड की तरह या उससे ज्यादा होती है। मार्जिन की कोई तय सीमा नहीं होती है। जो दवा का पत्ता 40 रुपए का थोक रेट में होता है फुटकर में उसकी एमआरपी 2 सौ रुपए तक है। जेनरिक की एमआरपी तय नहीं होने से आम आदमी को कितना राहत मिलेगा।
सरकार को चाहिए कि जेनरिक दवा के दाम उसके रैपर में ही कम अंकित हो। कौन सी जेनरिक दवा है यह आम नागरिक को समझ में आए। इसका उल्लेख रैपर में होना चाहिए। अन्यथा 50 से 90 प्रतिशत डिस्काउंट के दावे के बीच मरीज को राहत नहीं मिलेगी।
डॉ. एके सिन्हा, सेवानिवृत्त, सिविल सर्जन जिला अस्पताल

मरीजों को दवा के दाम में राहत देना है तो एथिकल व जेनरिक की अपेक्षा एक देश एक दाम निर्धारित किए जाएं। दवाओं की कीमत जब एक होगी तो इसका फायदा मरीजों को मिलेगा। दवाओं के दाम एक होने चाहिए।
डॉ.चंद्रेश जैन, सचिव, जबलपुर ड्रगिस्ट एंड केमिस्ट एसोसिएशन
मनीष गर्ग

patrika.com

जबलपुर. रेट में अंतर होने से मरीज यह तय नहीं कर पाता कि वह मनमानी छूट वाली जेनरिक दवा लेकर राहत महसूस करे कि अपने को ठगा हुआ माने। 80 फीसदी जेनरिक दवाओं के रैपर में एमआरपी एथिकल दवाओं की तरह या उनसे कहीं ज्यादा है। जानकार बताते हैं कि एथिकल और जेनरिक दोनों ही दवा कंपनियां साल्ट एक होते हैं, लेकिन खेल कंपनी के ब्रांडेड व जेनरिक नाम से हो रहा है। बाजार में जो एथिकल ब्रांडेड दवाएं हैं, उनके दाम पूरे देश में एक है और थोक व फुटकर का कमीशन भी फिक्स रहता है, जो कि 10 से 35 प्रतिशत तक रहता है।
मार्जिन की सीमा तय नहीं

सस्ती कही जाने वाली जेनरिक दवा के रेपर में जो उसकी कीमत दर्ज होती है, वह ब्रांडेड की तरह या उससे ज्यादा होती है। मार्जिन की कोई तय सीमा नहीं होती है। जो दवा का पत्ता 40 रुपए का थोक रेट में होता है फुटकर में उसकी एमआरपी 2 सौ रुपए तक है। जेनरिक की एमआरपी तय नहीं होने से आम आदमी को कितना राहत मिलेगा। यह दुकानदार की पर्चे पर मिलेगा।





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