यहां हैं रहते हैं सबसे ज्यादा मगरमच्छ, घरों के आसपास मचाते हैं उछल कूद

मगरमच्छ का नाम आते ही चेहरे पर भय का भाव आना लाजिमी है, लेकिन जबलपुर में एक ऐसी जगह है जहां मगरमच्छ लोगों के चेहरों पर खुशी और रोमांच भर देते हैं।

जबलपुर। मगरमच्छ का नाम आते ही चेहरे पर भय का भाव आना लाजिमी है, लेकिन जबलपुर में एक ऐसी जगह है जहां मगरमच्छ लोगों के चेहरों पर खुशी और रोमांच भर देते हैं। वे नदी में बकायदा तैरते और ठिठौलियां करते दिखते हैं। बरसात में तो चहल कदमी करते हुए लोगों के घरों के आसपास तक पहुंच जाते हैं। लोग उन्हें आश्चर्य के भाव से देखते ही रह जाते हैं। यह स्थान है परियट नदी..। खमरिया के समीप परियट नदी में करीब 12 किलोमीटर के दायरे में मगरमच्छों का ही जलवा है। सुबह-शाम उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ भी उमड़ती है।

प्राकृतिक रहवास
जानकार बताते हैं कि परियट नदी मगरमच्छों के प्राकृतिक आवास के लिए बेहद उपयुक्त है। यहां परियट डेम, लालपुर ग्राम, फगुआ नाला, चकरघटा, सोनपुर कल्वर्ट, मटामर के आपसपास तक मगरमच्छ देखे जा सकते हैं। इनकी तादादा सैकड़ों में है। 

देश में दूसरा स्थान
सेवानिवृत्त वन अधिकारी एबी मिश्रा ने बताया कि मगरमच्छ के मामले में जबलपुर का परियट दूसरे स्थान पर है। इसके अलावा तमिलनाडु के कोयम्बटूर में करीब 19 किमी क्षेत्र में इनका निवास स्थान है। परियट में स्थिति यह रहती है कि बरसात के मौसम में यदि नदी में ज्यादा पानी आ जाए तो ये मगरमच्छ लोगों के घरों के बाहर तक पहुंच जाते हैं।  


1995 में देखा गया पहली बार
भारतीय फारेस्ट ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष शंकरेन्दू नाथ ने बताया कि वर्ष 1995 में पहली बार मगरमच्छ को परियट नदी में देखा गया। इसके बाद इसका सर्वे शुरू हुआ। फिर वर्ष 2004 में इसकी रिपोर्ट तैयार की गई। इसमें इसकी पुष्टि हुई। यह बात अलग है कि वन विभाग व अन्य जिम्मेदार विभाग इनके संरक्षण के प्रति और इस स्थान को प्रसिद्धि दिलाने के प्रति उदासीन हैं।

अधर में परियोजना
शंकरेन्दु ने बताया कि वर्ष 2004 के प्रोजेक्ट के आधार पर वर्ष 2011 में भी यहां सर्वे कराया गया। मगरमच्छों के संरक्षण की योजना बनी। सरकार ने इसके लिए करीब 50 लाख रुपए स्वीकृत भी किए। खूब बातें की गईं कि इस क्षेत्र को मगरमच्छों की सेंचुरी के रूप में विकसित किया जाएगा, लेकिन काम गति नहीं पकड़ पाया। अगर इसे पूरी तरह विकसित किया जाए तो यह पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है। 


ग्राीमीणों को प्रशिक्षण 
बारिश के समय अक्सर मगरमच्छ गांवों व खेतों में आ जाते थे। कई बार पशुओं के शिकार की भी घटनाएं सामने आईं। इससे गांवों में भय का माहौल बन गया। मगरमच्छों की जान पर संकट गहराने लगा। इसको देखते हुए गांवों में जागरुकता कार्यक्रम चलाया गया। लोगों को समझाया गया कि किस तरह उनको पकड़कर वापस नदी में छोड़ा जा सकता है। भारतीय फारेस्ट ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष  शंकरेन्दु का कहना है कि यह स्थान बड़ा पर्यटन क्षेत्र बन सकता है। पूरे प्रदेश में प्राकृतिक अवस्था में यह जीव कहीं नहीं मिलता। इसके लिए बेहतर योजना और दृढ़ इच्छा शक्ति की जरुरत है।
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Abha Sen
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